भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 569

अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः । ५६९ ऐश्वर्यमायुधाभ्यासं पुत्रलाभोभिषेचनम् । आरोग्यं धनकामौ च शनिसूक्ष्मगते भृगौ ॥५०॥ (श.शु.) शनि के प्रत्यंतर में केतु के सूक्ष्मन्तर में ऐश्वर्य का लाभ, आयुध का अभ्यास, पुत्र का लाभ, अभिषेक, आरोग्यता आदि होता है॥५०॥ राजतेजोविकारत्वं स्वगृहे जायते कलिः । किंचित्पीडा स्वदेहोत्था शनिसूक्ष्मगते रवौ ॥५१॥ (श.सू.) शनि के प्रत्यंतर में सूर्य के सूक्ष्मान्तर में राज कार्य में विकार, अपने घर में कलि, अपने शरीर में कुछ पीड़ा होती है॥५१॥ स्फीतबुद्धिर्महारम्भो मदं तेजो बहुव्ययः । स्त्रीपुत्रैश्च समं सौख्यं शनिसूक्ष्मगते विधौ ॥५२॥ (श.चं.) शनि के प्रत्यंतर में चन्द्रमा के सूक्ष्मान्तर में संगीत का प्रेम, किसी बड़े कार्य का आरम्भ, यज्ञ में कमी, द्रव्य का भय और स्त्री पुत्र का सुख होता है॥५२॥ नेत्रोहानिर्महोद्वेगो वह्निक्षयभ्रमो कलिः । वातपित्तकृतापीडा शनेः सूक्ष्मगते कुजो ॥५३॥ (श.मं.) शनि के प्रत्यंतर में भौम के सूक्ष्मान्तर में नेत्र की हानि, उद्वेग, मंदाग्नि, क्षय, भ्रम, झगड़ा और वात पित्त से कष्ट होता है॥५३॥ पितृमातृविनाशश्च मनोदुःखं गुरुव्ययम् । सर्वत्र विफलं स्यात्तु शनिसूक्ष्मगतेप्यहौ ॥५४॥ (श.रा.) शनि के प्रत्यंतर में राहु के सूक्ष्मान्तर में पिता-माता की हानि, मन में दुःख, अधिक व्यय, और सब जगह विफलता होती है॥५४॥ सन्मुद्राभोगसन्मानं धनधान्यविवर्धनम् । छत्रचामरसम्प्राप्तिः शनेः सूक्ष्मगते गुरौ ॥५५॥ (श.बृ.) शनि के प्रत्यन्तर में गुरु के सूक्ष्मान्तर में द्रव्य का लाभ, धन धान्य की वृद्धि और छत्र चामर का लाभ होता है॥५५॥ इति शनि सूक्ष्मान्तर फलम्। अथ बुध प्रत्यंतरे बुधादीनां सूक्ष्मान्तर फलम् - सौभाग्यंराजसम्मानं धनधान्यादिसम्पदः । सर्वेषां प्रियदर्शी च बुधसूक्ष्मदशाफलम् ॥५६॥ (बु.बु.)