भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 591, कुल 800 में से

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श्रीः वृहत्पाराशरहोरायाः उत्तरार्धम् भाषाटीका सहितम् अष्टकवर्गाध्यायः । मैत्रेय उवाच- भगवन्सर्वमाख्यातं जातकं विस्तरेण मे । सहस्रायुतश्लोकैरशीत्यध्यायसंयुतैः ॥१॥ मैत्रेयजी ने कहा- हे भगवन् ! आपने एक हजार श्लोकों से युक्त ८० अध्याय (पूर्वखंड) में विस्तार पूर्वक सभी जातक को मुझसे कहा।।१।। संकरात्तत्फलानां तु ग्रहाणां गतिसंकरात् । नान्येनहीदृगस्येदमिति वक्तुमलं नराः ॥२॥ किन्तु ग्रहों की गति का परस्पर (संकर) मिश्रण होने से उनके फल में भी मिश्रण हो जाता है अतः इस प्रमाण से ऐसा फल कहना ऐसा निश्चय कर कहने को कोई समर्थ नहीं होता है।।२।। कलौ युगे ततोऽल्पैव बुद्धिः पापोत्तरा नराः । अतो न चास्य प्रचयगमनं न प्रयोजनम् ॥३॥ क्योंकि कलियुग में पूर्व युग से अल्प ही बुद्धि के और अधिक पापी होते हैं अतः उनके लिये इस महान् ग्रंथ का विचार करना और उसके प्रयोजन का कहना दुर्लभ ही है।।३।। एतावंतं कलामस्य प्रयोजनं प्रचयगमनं च कथमासीत् इति शंकायामाह- अत्र त्रेतायुगे केचिद्द्वापरे च कृतेयुगे । कुशाग्रमतयः सर्वे पुण्यभाजश्चिरायुषः ॥४॥ आप यह कह सकते हैं इतने काल पर्यन्त इस ग्रंथ का उपयोग कैसे हुआ और अब क्यों नहीं हो पा रहा है, इसका उत्तर स्वयं दे रहे हैं- हे मुनीश्वर! इस त्रेतायुग में, द्वापर में तथा सत्ययुग में मनुष्य कुशाग्रबुद्धि, पुण्यवान् और दीर्घायु होते थे। अतः वे पूर्व के कहे हुये शास्त्र को देखने और कहने में समर्थ थे।।४।।