भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 593, कुल 800 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 593

अष्टकवर्गाध्यायः । ५९३ इस प्रकार होराशास्त्र के जानने वालों ने सामान्य रीति से कहा है उसे मैंने संपूर्ण पूर्वाचार्यों के अनुसार कहा है॥११०॥ आयुश्च लोकयात्रा च शास्त्रेऽस्मितत्प्रयोजनम् । निश्चेतुं तन्न शक्नीति वशिष्ठो वा बृहस्पतिः ॥१११॥ इस शास्त्र में आयु का प्रमाण और मनुष्यों के सुख दुःख का वर्णन है यही इसका प्रयोजन है। किन्तु उन सबके निर्णय करने में वशिष्ठ या बृहस्पति भी समर्थ नहीं हो सकते हैं॥१११॥ किं पुनर्मनुजास्तत्र विशेषात्तु कलौ युगे । नष्टादिषु च नातीव द्रेष्काणादि फलेषु च ॥११२॥ साधारण मनुष्य कहां से निश्चय कर सकता है। विशेषकर कलियुग में विशेषकर नष्ट चौर आदि के प्रश्नों के उत्तर द्रेष्काणादि से देने में समर्थ नहीं हो सकते हैं॥११२॥ आचार्यस्य मुखादेतच्छास्त्रं तु शृणुयाद्बुधः । संप्रदायेन यः श्रोतश्चास्मिञ्छास्त्रे महामतिः ॥११३॥ इस शास्त्र को आचार्य के मुख से सुन कर संप्रदायानुसार इसमें परिश्रम करने वाला पुरुष श्रेष्ठ दैवज्ञ होता है॥११३॥ कर्मज्ञानविदा वेदो द्विधा यद्वत्तदाह्वये । होराशास्त्रं द्विधा प्रोक्तं संकीर्णनिश्चयादिति ॥११४॥ जिस प्रकार कर्मकांड और ज्ञानकांड से युक्त वेद एक होते हुये भी दो प्रकार का है उसी प्रकार से संकीर्ण और निश्चय से यह ज्योति शास्त्र भी दो प्रकार का है॥११४॥ प्रोक्तः संकीर्णभागस्तु निश्चयांशस्तु कथ्यते । योवेत्ति सम्यगेतत्तु दैवज्ञः स उदाहृतः ॥११५॥ इसमें संकीर्णभाग पूर्वार्ध (पूर्वभाग) में वर्णित है और निश्चय भाग को इस उत्तरार्ध में कह रहा हूँ जो सम्यक् प्रकार से इसे जानता है उसे ही दैवज्ञ कहते हैं॥११५॥ भावदृष्ट्यांदिषु प्रोक्तानर्थान्सम्यग्विचार्य च । समीचीनांस्तु संगृह्य विरुद्धांस्तु परित्यजेत् ॥११६॥