बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । तनु आदि बारह भाव और उसपर दृष्टि का योग ठीक-ठीक विचार कर जो उत्तम बल हों उनको ग्रहण कर हीनवल का त्याग कर दे।।१६।। आयुर्दायैः परं योगैः फलान्यष्टकवर्गंतः । तन्वादीनां तु भावानां सूक्तैर्भावादिभिः फलैः ।।१७।। ज्ञात्वादौ करणं स्थानं बिन्दुरेखे च वर्गणाम् । क्रमादष्टकवर्गस्य पृथक्कृत्य फलं वदेत् ।।१८।। पहले आयुष्य का ज्ञान करे इसके बाद नाभासादिक योगों के फल का ज्ञान करें दोनों का ज्ञान हो जाने के बाद प्रत्येक भावों के अष्टकवर्ग के अनुसार करण और स्थान को बिन्दु और रेखा के स्थान पर मानकर योगकर उन भावों के फल को कहे।।१८।। अथ रवेः करणसंख्यां-करणप्रदग्रहांश्चाह- तनुस्वायुस्त्रिरिष्फेषु पंचकामेऽर्णवाः सुखे । अरौ भाग्ये त्रयः पुत्रे षट् करौ खे भवे चभूः ।।१९।। लग्नेकुजीवशुक्रज्ञास्तन्नौखे मरणेऽपि च । रविभौमार्कि चन्द्रार्या व्यये ज्ञेन्दुसितार्यकाः ।।२०।। अष्टक वर्ग क्या है— प्रायः फलकहने के तीन प्रकार हैं (१) जन्म लग्न से ग्रहों की स्थिति के अनुसार। (२) चन्द्रलग्न से ग्रहों की स्थिति के अनुसार। (३) नवांश कुंडली के अनुसार फल कहने की विधि है। जातक के जन्म लग्न से उसके शरीर के सुख दुःखादि का विचार किया जाता है और चन्द्रमा से मन का विचार किया जाता है। मन ही की शान्ति एवं अशान्ति और सबलता वा निर्बलता के अनुसार इहलौकिक और पारलौकिक सभी शुभ अशुभ कार्य हुआ करते हैं। अतः फलादेश का मुख्य अंग चन्द्रमा ही हुआ, इसलिये ही आचार्यों ने यह निश्चय किया है कि मनुष्य के जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि पर हो उस राशि से जिन जिन भावों में ग्रहगण भ्रमण करते हुये जाते हैं वैसा वैसा ही फल उस उस समय में मनुष्यको होते हैं। इसी को गोचर फल कहते हैं। किन्तु यह विधि गौण है। क्यों कि सम्पूर्ण मानव मात्र के चन्द्रमा इन्हीं बारह राशियों में से किसी राशि में रहता है। अतः साधारण गोचर फल केवल बारह ही प्रकार का होगा किन्तु ऐसा होता नहीं है। इसलिये आचार्यों