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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

५९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । तनु आदि बारह भाव और उसपर दृष्टि का योग ठीक-ठीक विचार कर जो उत्तम बल हों उनको ग्रहण कर हीनवल का त्याग कर दे।।१६।। आयुर्दायैः परं योगैः फलान्यष्टकवर्गंतः । तन्वादीनां तु भावानां सूक्तैर्भावादिभिः फलैः ।।१७।। ज्ञात्वादौ करणं स्थानं बिन्दुरेखे च वर्गणाम् । क्रमादष्टकवर्गस्य पृथक्कृत्य फलं वदेत् ।।१८।। पहले आयुष्य का ज्ञान करे इसके बाद नाभासादिक योगों के फल का ज्ञान करें दोनों का ज्ञान हो जाने के बाद प्रत्येक भावों के अष्टकवर्ग के अनुसार करण और स्थान को बिन्दु और रेखा के स्थान पर मानकर योगकर उन भावों के फल को कहे।।१८।। अथ रवेः करणसंख्यां-करणप्रदग्रहांश्चाह- तनुस्वायुस्त्रिरिष्फेषु पंचकामेऽर्णवाः सुखे । अरौ भाग्ये त्रयः पुत्रे षट् करौ खे भवे चभूः ।।१९।। लग्नेकुजीवशुक्रज्ञास्तन्नौखे मरणेऽपि च । रविभौमार्कि चन्द्रार्या व्यये ज्ञेन्दुसितार्यकाः ।।२०।। अष्टक वर्ग क्या है— प्रायः फलकहने के तीन प्रकार हैं (१) जन्म लग्न से ग्रहों की स्थिति के अनुसार। (२) चन्द्रलग्न से ग्रहों की स्थिति के अनुसार। (३) नवांश कुंडली के अनुसार फल कहने की विधि है। जातक के जन्म लग्न से उसके शरीर के सुख दुःखादि का विचार किया जाता है और चन्द्रमा से मन का विचार किया जाता है। मन ही की शान्ति एवं अशान्ति और सबलता वा निर्बलता के अनुसार इहलौकिक और पारलौकिक सभी शुभ अशुभ कार्य हुआ करते हैं। अतः फलादेश का मुख्य अंग चन्द्रमा ही हुआ, इसलिये ही आचार्यों ने यह निश्चय किया है कि मनुष्य के जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि पर हो उस राशि से जिन जिन भावों में ग्रहगण भ्रमण करते हुये जाते हैं वैसा वैसा ही फल उस उस समय में मनुष्यको होते हैं। इसी को गोचर फल कहते हैं। किन्तु यह विधि गौण है। क्यों कि सम्पूर्ण मानव मात्र के चन्द्रमा इन्हीं बारह राशियों में से किसी राशि में रहता है। अतः साधारण गोचर फल केवल बारह ही प्रकार का होगा किन्तु ऐसा होता नहीं है। इसलिये आचार्यों

अष्टकवर्गाध्यायः । ५९५ ने जन्मकालीन ग्रहस्थिति और जन्मलग्न स्थित राशि इन आठ स्थानों से यदि गोचर फल का विचार किया जाय तो अवश्य विश्वास योग्य होगा। ऐसा निश्चय किया है। इसी को अष्टक वर्ग विधि कहते हैं। प्रत्येक जन्मकुंडली में सातग्रह और जन्मलग्न अर्थात् इन आठ पदार्थों से किसी न किसी स्थान में शुभ और अशुभ फलों में विशेषता हो जाती है। इसी को आचार्यों ने प्रत्येक ग्रह एवं लग्न अपने अपने स्थान से जिन जिन स्थानों में शुभ फल देता है इस शुभफल दायित्व स्थान को रेखा या बिन्दुद्वारा दिखलाया है। किसी आचार्य ने बिन्दु संकेत से शुभफल माना है और किसी ने रेखा द्वारा शुभ फल माना है इसके भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये चाहे जिस चिह्न से मानाजाय। इस ग्रंथ में शून्य को करण कहते हैं। अतः सूर्य की करण संख्या कह रहे हैं- सूर्य से १, २, ८, ३, १२ भावों में पांच पांच करण होता है।, ७, ४ भाव में चार चार करण होता है। ६, ९ भाव में तीन तीन करण होता है। ५ भाव में ६ करण होता है। १० भाव में दो करण और ११ भाव में एक करण होता है। १९ अर्थात् सूर्य से १, २, ८ भाव में लग्न, चंद्र, शुक्र और बुध ये पांच ग्रह करण देने वाले हैं, १२ वें भाव में सूर्य, भौम, शनि, चंद्र, गुरु ये पांच करण देने वाले हैं।।२०।। सुखे होरेन्दुशुक्राश्च धर्मेऽर्कार्किकुजा अरौ । होराज्ञार्येंदवः कामे भवे दैत्येन्द्रपूजितः ॥२१॥ ४ थे भाव में बुध, चन्द्र, शुक्र, गुरु ये चार ग्रह करण देने वाले हैं। नवम भाव में लग्न, चन्द्र, शुक्र ये तीन ग्रह करण प्रद हैं। ६ भाव में सूर्य शनि, मंगल ये तीन ग्रह करण देने वाले हैं। ७ भाव में लग्न, बुध, शुक्र, चंद्र ये चार ग्रह करण देने वाले हैं। ११ भाव में केवल शुक्र करण देने वाले हैं।।२१।। सहजेऽर्कार्किशुक्रार्यभौमाः खे गुरुभार्गवौ । सुतेऽर्कार्कीन्दुलग्नारशुक्राः स्युः करणं रवेः ॥२२॥ तीसरे भाव में सूर्य, शनि, शुक्र, गुरु, मंगल ये पांच ग्रह करण देने वाले हैं। १० भाव में गुरु, शुक्र ये दो ग्रह करण देने वाले हैं। ५ भाव में सूर्य, शनि, चंद्र, लग्न, मंगल, शुक्र ये छः ग्रह करण देने वाले हैं। यह सूर्य की करण संख्या है।।२२।।

? Actually, in Devanagari OCR and transcription of this verse from BPHS: Let's transcribe what is visible: Most faithfully: होरार्कारार्किभृगवोऽङ्गार्केन्द्वार्किभार्गवाः ॥२४॥(or if it looks like झ:होरार्कारार्किभृगवोऽझार्केन्द्वार्किभार्गवाःorहोरार्कारार्किभृगवोऽङ्गार्केन्द्वार्किभार्गवाः). Wait, look at ङ्ग: In Devanagari, ङ्गis composed of+. Does it look like with aunderneath? Yes! Look at it! Top:(short stem, S-shape, with a dot? or just S-shape). Bottom:suspended below the! In classical Devanagari fonts (like Nirnaya Sagar), the conjunct ligature ङ्गis: an upperand a lowerhanging from the bottom of the! And to its right is the vowel sign (aa-matra)! Wait! An upperand a lowerlooks EXACTLY like a letter with a loop at the bottom, and withit becomesङ्गा! YES! That is the ligature ङ्ग! In old fonts,

अष्टकवर्गाध्यायः । ५९७ दूसरे भाव में लग्न, बुध, सूर्य, चन्द्रमा, शनि और शुक्र, ये ६ करण देने वाले हैं। तीसरे भाव में केवल गुरु करण देने वाला है। चौथे भाव में सूर्य, शनि, चन्द्र, लग्न, भौम ये पांच करण प्रद हैं। पाचवें भाव में लग्न, चन्द्र, गुरु, रवि ये चार करण प्रद हैं। छठे भाव में शुक्र, बुध, गुरु ये तीन ग्रह करण प्रद हैं। सातवें भाव में भौम लग्न, शनि ये तीन करण प्रद हैं। आठवें भाव में भौम, लग्न, शनि, शुक्र, चन्द्रमा ये ५ करण प्रद हैं।।२५।। होराकरार्किविज्जीवाः शनिः खं सकलाःक्रमात्। नवम भाव में लग्न, सूर्य, भौम, शनि, बुध, गुरु ये ६ ग्रह करण प्रद हैं। दशम भाव में केवल शनि करण प्रद है, एकादश भाव में शून्य और बारहवें भाव में सभी करणप्रद होते हैं। स्पष्टार्थचन्द्रकरणचक्रम्।

मा.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ल.सू.स.
त.
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सु.०.
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अथ भौमस्यकरणसंख्यांकरणप्रदग्रहांश्चाह-
व्ययवेश्मसुतस्त्रोषु षट्सप्त धनधर्मयोः ।।२६।।
होराभृत्योः शरा वेदा विक्रमे खेत्रयः क्षते ।
द्वौभवे शून्यमेवं स्यात्करणं भूमिजस्य तु ।।२७।।
'भौम से १२, ४, ५, ७ भाव में ६ करण, २, ९ भाव में ७ करण।।२६।।
१, ८ भाव में ५ करण, ३ भाव में ४ करण, २ भाव में ३ करण, ६ भाव में
२ करण, ११ भाव में शून्य करण होते हैं।।२७।।

५९८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्। कुजस्यार्केन्दुविज्जीवसिता लग्नशनी च ते । सितारगुरुमंदाः स्युर्धर्मोक्तेषु कुजं विना ।।२८।। भौम से १ भाव में सूर्य, चंद्रमा, बुध, गुरु, शुक्र ये ५ करणप्रदग्रह हैं, २ भाव में लग्न, शनि, सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र ये ७ करणप्रद ग्रह हैं। ३ भाव में शुक्र, भौम, गुरु, शनि ये ४ करणप्रद हैं। ४ भाव में सूर्य, चंद्र, बुध, गुरु, शुक्र लग्न ये ६ ग्रह करणप्रद हैं।।२८।। चन्द्रारगुरुशुक्रार्किलग्नानि कुजभास्करी । ज्ञेन्द्वर्कसितलग्नार्या एषु शुक्रं विना ततः ।।२९।। ५ भाव में चन्द्र, भौम, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न ये ६ ग्रह करणप्रद हैं। ६ भाव में भौम, शनि ये दो करणप्रद हैं, ७ भाव में बुध, चंद्र, सूर्य, शुक्र, गुरु ये ६ करणप्रद ग्रह हैं।।२९।। विना शनिं सप्तधर्मे सितेन्दुज्ञा वियत्ततः । अर्कार्किक्षेंदुलग्णाराः करणं प्रोच्यते क्रमात् ।।३०।। ८ भाव में बुध, चंद्र, सूर्य, गुरु, लग्न ये ५ करणप्रद ग्रह हैं, ९ भाव में सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र लग्न ये ७ करणप्रद ग्रह है, १० भाव में शुक्र, चंद्र, बुध ये तीन करणप्रद ग्रह हैं। ११ भाव में शून्य और १२ भाव में सूर्य, शनि, बुध, चंद्र, लग्न, भौम ये ६ करणप्रद ग्रह हैं।।३०।। स्पष्टार्थभौमकरणचक्रम्।

भा.सू.चं.मं.बु.वृ.शु.श.ल.स.
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अष्टकवर्गाध्यायः। ५९९ अथ बुधस्य करण संख्यां करणप्रदग्रहांश्चाह- तनुस्वगृहकर्मारि धर्मेष्वग्निर्मृतौ करौ । मातृस्त्रियों रसा लाभे शून्यं पुत्रे व्यये शराः ॥३१॥ बुध से १,२,४,१०,६,९ भाव में तीन करण, ८ भाव में २ करण, ३, ७ भाव में ६ करण, ११ भाव में शून्य और १२ भाव में ५ करण होता है॥३१॥ बुधस्यार्केन्दुगुरवो गुरुसूर्यबुधाः क्रमात् । लग्नाक्रारार्विचंद्रार्या ज्ञाकार्या हि बुधस्यतु ॥३२॥ बुध से १ भाव में सूर्य, चंद्र, गुरु ये तीन करणप्रद ग्रह हैं, २ भाव में गुरु, सूर्य, बुध ये तीन करणप्रद ग्रह हैं। ३ भाव में लग्न, सूर्य, शनि, चंद्र, भौम, गुरु ये ६ करणप्रद ग्रह हैं, ४ भाव में बुध, सूर्य, गुरु ये तीन करणप्रद ग्रह हैं॥३२॥ जीवारेन्द्वार्किलग्नानि शुक्रमंदधरासुताः । ज्ञेन्दुलग्नार्कशुक्रार्या ज्ञाकौ जीवेन्दुलग्नकाः ॥३३॥ अकार्यशुक्राः शून्यं च होरेन्द्वारार्किभार्गवाः । ५ भाव में गुरु, भौम, चंद्र, शनि, लग्न ये ५ करणप्रद ग्रह हैं। ६ भाव में शुक्र, शनि, भौम ये तीन करणप्रद ग्रह हैं। ७ भाव में बुध, चंद्र, लग्न, सूर्य, शुक्र, गुरु ये ६ करणप्रद ग्रह हैं, ८ भाव में बुध, सूर्य ये दो करणप्रद ग्रह हैं। ८ भाव में बुध, सूर्य ये दो करणप्रद ग्रह हैं। ९ भाव में गुरु, चंद्र, लग्न ये ३ करणप्रद ग्रह हैं, १० भाव में सूर्य, गुरु, शुक्र ये तीन करणप्रद ग्रह हैं, ११ भाव में शून्य और १२ भाव में लग्न, चंद्र, भौम, शनि, शुक्र ये ५ करणप्रद ग्रह हैं॥३३॥ स्पष्टार्थबुधकरणचक्रम्।

मासू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ल.
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६०० · बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ गुरोः करण संख्यां करणप्रदग्रहांश्चाह- रूपं धनाययोः खे द्वौ व्यये सप्तक्षतेऽर्णवाः ॥३४॥ गुरु से २ रे भाव में १ करण, १० भाव में २ करण, ११ भाव में १ करण, १० भाव में २ करण, १२ भाव में ७ करण, ६ भाव में ४ करण ।। ३४ ।। मृतिविक्रमयोः पंच गुरोः शेषेषु वह्नयः । शुक्रेन्दुमंदा लग्ने स्वे आये मंदश्च विक्रमे ।। ३५ ।। ८, ३ भाव में ५ करण और शेष भावों (१, ४, ५, ७, ९) में ३ करण होते हैं। गुरु से १ भाव में शुक्र, चंद्र, शनि ये तीनग्रह करणप्रद हैं, २ और ११ भाव में केवल शनि करणप्रद है ।। ३५ ।। लग्णारेन्दुज्ञभृगवः सुतेऽकार्यकुजा गृहे । शुक्रमंदेदवो द्यूने बुधशुक्रशनैश्चराः ।। ३६ ।। ३ भाव में लग्न, भौम, चंद्र, बुध, शुक्र ये पांच ग्रह करणप्रद हैं। ५ भाव में सूर्य, गुरु, भौम ये तीन करणप्रद हैं, ४ भाव में शुक्र, शनि, चंद्र ये तीन ग्रह करणप्रद हैं, ७ भाव में बुध, शुक्र, शनि ये तीन ग्रह करणप्रद हैं ।। ३६ ।। जीवाराकैन्दवः शत्रौ मंदं विना व्यये सर्वे । कर्मणीन्दुशनी धर्मे मंदारगुरवो मृतौ ।। ३७ ।। ६ भाव में गुरु, भौम, सूर्य, चन्द्र ये चार ग्रह करणप्रद हैं, १२ भाव में शनि को छोड़कर सभी ग्रह करणप्रद हैं, १० भाव में चंद्र, शनि ये २ ग्रह, ९ भाव में शनि, भौम, गुरु ये तीन ग्रह करणप्रद हैं ।। ३७ ।। स्पष्टार्थगुरुकऱणचक्रम् ।

मासू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ल.
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ये पांच ग्रह करणप्रद हैं। अथ भृगोः करणसंख्यां करणप्रद ग्रहांश्चाह- सुतायुर्विक्रमेष्वक्षितनुस्वव्ययखेष्विषुः ।।३८।। शुक्र से ५, ८, ३ भाव में २ करण, १, २, १२, १० भाव में ५ करण।।३८।। अष्टौस्त्रियामरौ षड्भूर्धर्मे मित्रेऽग्निखं भवे । लग्ने स्वेऽर्करविज्जीवमंदाः सर्वे च काम मे ।।३९।। ७ भाव में ८ करण, ६ भाव में ६ करण, ९ भाव में १ करण, ४ भाव में ३ करण और ११ भाव में शून्य करण होता है। शुक्र से १, २ भाव में सूर्य, भौम, गुरु, बुध, शनि ये ५ करणप्रद ग्रह हैं। ७ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और लग्न ये आठ करणप्रद ग्रह हैं।।३९।। अर्कार्यो विक्रमस्थाने सुतेऽर्कारौ शुभे रविः । सुखेऽर्कबुधजीवाः स्युर्भौमज्ञौ मृत्तिभे द्विज ।।४०।। ३ भाव में

६०२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ शनेःकरणसंख्यां-करणप्रद ग्रहांश्चाह- शुक्रार्केन्द्वार्किलग्ग्यार्याः शत्रौ शून्यं भवेव्यये । होरार्किबुधशुक्रार्यास्तन्वारङ्गेन्दिनाश्च खे ।।४१।। ६ भाव में शुक्र, सूर्य, चन्द्र, शनि, लग्न और गुरु ये ६ करणप्रद ग्रह हैं। ११ भाव में कोई नहीं है। १२ भाव में लग्न, शनि, बुध, शुक्र, गुरु ये ५ करणप्रद ग्रह हैं। १० भाव में लग्न, भौम, बुध, चंद्र, सूर्य ये ५ करणप्रद ग्रह हैं।।४१।। स्वस्त्रीधर्मेषु सप्ताङ्गं मृतिहोरगृहेषु च । आज्ञाभ्रातृव्यये वेदा रूपं शत्रौ सुते शराः ।।४२।। शनि से २।७।९ भाव में ७ करण, ८ लग्न, ४ भाव में ६ करण, १०।३।१२ भाव में ४ करण, ६ भाव में १ करण, ५ भाव में ५ करण।।४२।। आये शून्यं शनेरेवं करणं प्रोच्यते बुधैः । गृहे तनौ च लग्नाकौ स्वस्त्रियोश्च रविं बिना ।।४३।। ११ भाव में शून्य करण होता है। शनि से ४।१ भाव में लग्न, सूर्य को छोड़कर सभी ग्रह करणप्रद होते हैं। २।७ भाव में रवि को छोड़कर शेष ७ ग्रह।।४।। हित्वा धर्मे बुधं माने लग्नाररविचन्द्रजान् । ततो भ्रातरि जीवार्कबुध शुक्राः क्षते रविः ।।४४।। ९ भाव में बुध के बिना ७ ग्रह। १० भाव में लग्न, भौम, रवि, चंद्र के बिना (चंद्र, गुरु, शुक्र, शनि) चार ग्रह, ३ भाव में गुरु, सूर्य, बुध, शुक्र ये चार ग्रह ६ भाव में केवल सूर्य।।४४।। व्यये लग्नेन्दुमंदार्काः सितार्केन्दुज्ञलग्रकाः । सुते मृतौ बुधाकौ च हित्वाऽऽये खं शनेर्विंदः।।४५।। १२ भाव में लग्न, चंद्र, शनि, सूर्य ये चार ग्रह। ५ भाव में शुक्र, सूर्य, चंद्र, बुध, लग्न ये चार ग्रह, ८ भाव में चन्द्र, सूर्य ये २ ग्रह, ११ भाव में कोई नहीं करणप्रद हैं। यह शनि की बिन्दु संख्या कही गई है।।४५।।

अष्टकवर्गाध्यायः । ६०३ स्पष्टार्थाशिनेःकरणचक्रम्। | मा. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ल. | स. | | त. | | ० | ० | ० | ० | ० | ० | | ६ | | ध. | | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ७ | | स. | ० | | | ० | ० | ० | | | ४ | | स. | | ० | ० | ० | ० | ० | ० | | ६ | | स. | ० | ० | | ० | | ० | | ० | ५ | | रि. | ० | | | | | | | | १ | | जा. | | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ७ | | मृ. | | ० | ० | | ० | ० | ० | ० | ६ | | ध. | ० | ० | ० | | ० | ० | ० | ० | ७ | | क. | | ० | | | ० | ० | ० | | ४ | | आ | | | | | | | | | | | व्य | ० | ० | | | | | ० | ० | ४ | अथ लग्नस्य करणसंख्या करणप्रदग्रहांश्चाह- तनौ तुर्ये च वह्निः स्यादुश्चिक्ये द्वौ धने शराः । बुद्धिमृत्यंकरिःफेपु षट्खेशक्षतराशिषु ॥४६॥ लग्न और ४ भाव में ३ करण, ३ भाव में २ करण, २ भाव में ५ करण, ५।८।९।१२ भाव में ६ करण, १०।११।६ भाव में १ करण॥४६॥ रूपं स्त्रियां गुरुं त्यक्त्वा लग्नस्य करणं विदुः । होरासूर्येन्दवो लग्ने लग्नरेंद्विनसूर्यजाः ॥४७॥ ७ भाव में ७ करण होते हैं। लग्न में लग्न, सूर्य, चंद्र ये तीन करणप्रद हैं। २ भाव में लग्न, भौम, चंद्र, सूर्य, शनि ये ५ करणप्रद हैं॥४७॥ गुरुज्ञौ लग्नचन्द्रारा लसूचंमंवुसौरयः । क्षतेशुक्रस्तथा चैकः कामे सर्वे गुरुं विना ॥४८॥ ३ भाव में गुरु, बुध ये २ करणप्रद हैं। ४ भाव में लग्न, चन्द्र, भौम करणप्रद हैं। ५ भाव में लग्न, सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, शनि ये करणप्रद हैं। ६ भाव में शुक्र, ७ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, शुक्र, शनि ये करणप्रद हैं॥४८॥ मृतौ भृगुबुधौ त्यक्त्वा धर्मेगुरुसितौ विना । कर्मण्याये तथा शुक्नो व्यये सूर्येन्दुवर्जिताः ॥४९॥

६०४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । ८ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, गुरु, शनि, लग्न ये ६ ग्रह करणप्रद हैं। ९ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, शनि, लग्न ये करणप्रद हैं। १० भाव में और ११ भाव में शुक्र, करणप्रद हैं। १२ भाव में भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न ये ६ ग्रह करणप्रद हैं॥४९॥ लग्नस्यैवं तु संप्रोक्तं करणं द्विजपुंगव । हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! इस प्रकार से लग्न के करण (बिन्दु) संख्या को कहा। उक्तान्ये स्थानदातारं इति स्थानं विदुर्बुधाः । अथ स्थानग्रहान्वक्ष्ये सुखवीधाय सूरिणाम् ।।५०।। पहले सूर्यादि ग्रहों के बिन्दु देनेवाले ग्रहों को कहकर उससे भिन्न स्थान (रेखा) देनेवालों को कहते हैं।।५०।। अथ रवि भावस्थानप्रदानग्रहान् आह- स्वायुस्तनुषु मंदारसूर्यजीवबुधौ सुते । विक्रमे ज्ञेन्दुलग्नानि लग्नाकार्किकुजा गृहे ।।५१।। सूर्य से २।७, १ भाव में शनि, भौम, सूर्य ये तीन रेखाप्रद ग्रह हैं। ५ भाव में गुरु, बुध ये दो ग्रह, २ भाव में बुध, चन्द्र और लग्न ये ३ ग्रह। ४ भाव में लग्न सूर्य, शनि, भौम ये ४ ग्रह।।५१।। खे ज्ञेन्दुरवयश्चाये सर्वे शुक्रं विना व्यये । लग्नशुक्रवुधाः शत्रौ ते च जीवसुधाकरौ ।।५२।। १० भाव में लग्न, सूर्य, शनि, भौम, बुध और चन्द्र ये ६ ग्रह। ११ भाव में शुक्र से भिन्न (सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शनि, लग्न ये ७ ग्रह। १२ भाव में लग्न, शुक्र, बुध ये ३ ग्रह। ६ भाव में लग्न, शुक्र, बुध, गुरु, चंद्र ये ५ ग्रह।।५२।।


सूर्याष्टकवर्गः। रे. सं. ४८

सू.चंमं.बु.बृ.शु.श.ल.
१०१२
१११११०
१०११
१११२
१०१०१२१०
११११११

सूर्याष्टकवर्ग चक्र (कुण्डली)

  • प्रथम भाव (१): ।।। ४ सू.
  • द्वितीय भाव (२): ।।। शु ३, च
  • तृतीय भाव (३): ।।।।।। २
  • चतुर्थ भाव (४): ।।। २
  • पंचम भाव (५): ।। ११ मं.
  • षष्ठ भाव (६): ।।।।। ९
  • सप्तम भाव (७): ।।।। १० ल
  • अष्टम भाव (८): ।।।।।।। (७)
  • नवम भाव (९): ।।।। ७
  • दशम भाव (१०): ।। ६
  • एकादश भाव (११): ।।।। बु ५ / वृ
  • द्वादश भाव (१२): ।।।।। २

, लग्न!) 7th bhava: Surya, Chandra, Bhauma, Guru, Budha, Shukra = 6 Shloka 55: 8th bhava: Surya, Budha, Guru = 3 9th bhava: Shukra, Chandra = 2 10th bhava: Surya, Budha, Guru, Shukra, Chandra, Lagna, Bhauma = 7 11th bhava: Surya, Chandra, Bhauma, Budha, Shukra, Shani, Lagna = 7 12th bhava: 0. Sum of bhavas: 1: 3 2: 2 3: 7 4: 3 5: 4 6: 5 7: 6 8: 3 9: 2 10: 7 11: 7 12: 0 Total = 3 + 2 + 7 + 3 + 4 + 5 + 6 + 3 + 2 + 7 + 7 + 0 = 49! Yes! In Chandrashtakavarga according to this tradition (some versions have 49, some 48; here it has 49). And in the chart, the Chandra is in Mithuna (Rashi 3)! Since Chandra is in 3 (Gemini): Bhava 1 = Rashi 3 -> 3 rekhas? Wait, the chart has:

६०६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।

अथ भौमभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह-

लग्नमन्दकुजा भौमो होराज्ञेन्दुदिनाधिपाः । मन्दारौ ज्ञरवी ज्ञेन्दुजवार्कतनुभार्गवाः ॥५६॥ भौम से १ भाव में लग्न, शनि, भौम ये तीन रेखाप्रद हैं। २ भाव में भौम, ३ भाव में लग्न, बुध, चंद्र, सूर्य ये ४ रेखाप्रद हैं। ४ भाव में शनि, भौम। ५ भाव में बुध, सूर्य। ६-भाव में बुध, चंद्र, गुरु, सूर्य, लग्न, शुक्र ये ६ ग्रह॥५६॥ मन्दारौ तौ सितश्चार्किकुजार्कार्यार्किलग्नकाः । सर्वे गुरुसितौ स्थानं भौमस्यैवंविदुर्बुधाः ॥५७॥ ७ भाव में शनि, भौम, ८ भाव में शनि, भौम, शुक्र ये ३ रेखाप्रद हैं। ९ भाव में शनि, १० भाव में भौम, सूर्य, गुरु, शनि, लग्न ११ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न और १२ भाव में गुरु, शुक्र ये २ ग्रह रेखाप्रद हैं॥५७॥ भौमभावस्थानप्रदान्ग्रहान्          भौमस्याष्टकवर्गः रे. सं. ३९

मं.बु.बृ.शु.श.सू.चं.ल.
१०
११११११
१११२१२१०१०
११११
१०१०
११११
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|  ।।१२        |   ।।।।१०    |  ।।।९       |  ।।मं.११  |
|              |             |             |           |
|--------------+-------------+-------------+-----------|
|  ।।।९        |  ।।।।।२     |  ।।।।।।श८   |  ।।।६     |
|              |             |             |           |
|--------------+-------------+-------------+-----------|
|  ।।।।च३      |  ।।सू.४     |  ।।।बु५वृ   |  ।।।बु५वृ |
\-------------------------------------------------/

(कुण्डली चक्र में राशियों के अनुसार रेखाएँ एवं ग्रह स्थिति अंकित हैं)

अथ बुधभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह-

लग्नमन्दारशुक्रज्ञा लग्नारेन्दुसितार्कजाः । शुक्रज्ञौ लग्नचन्द्रार्की, सितारज्ञार्किभार्गवाः ॥५८॥ बुध से १ भाव में लग्न, शनि, भौम, शुक्र, बुध ये ५ रेखाप्रद हैं। २ भाव में लग्न, भौम, चंद्र, शुक्र, शनि ये ४ रेखाप्रद हैं। ३ भाव में शुक्र बुध रेखा देने वाले हैं। ४ भाव में लग्न, चंद्र, शनि, शुक्र, भौम ये रेखाप्रद हैं। ५ भाव में बुध, सूर्य, शुक्र रेखाप्रद हैं॥५८॥ जीवज्ञार्केन्दुलग्नानि भूमिपुत्रशनैश्चरौ । तौ च लग्नेन्दुशुक्रार्या मन्दारार्कज्ञभार्गवाः ॥५९॥

अष्टकवर्गाध्यायः । ६०७ लग्नम्न्दारविच्चन्द्राः सर्वे जीवज्ञभास्कराः । ६ भाव में गुरु, बुध, सूर्य, चंद्र ये रेखाप्रद हैं। ७ भाव में भौम, शनि ये रेखाप्रद हैं। ८ भाव में लग्न, चंद्र, शुक्र, गुरु, भौम, शनि ये रेखाप्रद हैं। ९ भाव में शनि, भौम, सूर्य, बुध, शुक्र ये रेखाप्रद हैं। १० भाव में लग्न, शनि, भौम, बुध, चन्द्र रेखाप्रद हैं। ११ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, शुक्र, शनि ये रेखाप्रद हैं। १२ भाव में गुरु, बुध, सूर्य रेखाप्रद हैं।।५९।। बुधभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह रे. स. ५४ . बुधस्याष्टकवर्गः

बु.बृ.शु.श.सू.चं.मं.ल.
११
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१२१०
१०१११०
१११०१०११
१२११११११

[बुधस्याष्टकवर्ग चक्र:] तनु/लग्न: ।।।।बु ५ वृ; द्वितीय: ।।।।सू. ४; तृतीय: ।।।शु. ३ चं; चतुर्थ: ।।।। २, ।।।।।। ४; पंचम: ।।।।| ६; षष्ठ: ५, ।।।।। ।७; सप्तम: ।।।।।। ७ श; अष्टम: ।।। ९; नवम: ।।।। १०; दशम: ।।।।।। मं ११; एकादश/द्वादश: ।।।।| १२ अथ गुरोः भावस्थानप्रदान्ग्रहानाह- गुरोर्लग्नेसुखे जीवलग्नार्कबुधाः धने ।।६०।। गुरु से १ । ४ भाव में गुरु, लग्न, भौम, सूर्य, बुध ये ५ ग्रह रेखाप्रद हैं।।६०।। चन्द्रशुक्रौ च दुश्चिक्ये मन्दार्यार्काः शनिव्यये । सुते शुक्रेन्दुलग्नज्ञश्चन्द्रंविनात्वरौ ।।६१।। २ भाव में गुरु, लग्न, भौम, सूर्य, बुध, चंद्र, शुक्र ये ७ ग्रह रेखाप्रद हैं। ३ भाव में शनि, गुरु, सूर्य ये ३ रेखाप्रद हैं। ५ भाव में शुक्र, चंद्र, लग्न, बुध, शनि ये ५ ग्रह रेखाप्रद हैं। ६ भाव में शुक्र, लग्न, बुध, शनि ये ४ ग्रह रेखाप्रद हैं।।६१।। लग्नार्याऽर्केन्दवोऽस्ते मृतौ जीवार्कभूसुताः । धर्मे शुक्रार्कलग्नेन्दुबुधाः मंदं विनाऽऽयमे ।।६२।। माने गुरुबुधारार्कशुक्रहोरास्तथा विदुः । ७ भाव में लग्न, गुरु, भौम, सूर्य, चंद्र ये रेखाप्रद हैं। ८ भाव में गुरु, सूर्य, भौम ये रेखाप्रद हैं। ९ भाव में शुक्र, सूर्य, चंद्र, बुध ये रेखाप्रद हैं। ११ भाव

६०६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ भौमभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह- लग्नमन्दकुजा भौमो होराज्ञेन्दुदिनाधिपाः । मन्दारौ झरवी ज्ञेन्दुजवार्कतनुभार्गवाः ॥५६॥ भौम से १ भाव में लग्न, शनि, भौम ये तीन रेखाप्रद हैं। २ भाव में भौम, ३ भाव में लग्न, बुध, चंद्र, सूर्य ये ४ रेखाप्रद हैं। ४ भाव में शनि, भौम। ५ भाव में बुध, सूर्य। ६ भाव में बुध, चंद्र, गुरु, सूर्य, लग्न, शुक्र ये ६ ग्रह ॥५६॥ मन्दारौ तौ सितश्चार्किकुजार्कार्यार्कि लग्नकाः । सर्वे गुरुसितौ स्थानं भौमस्यैवंविदुर्बुधाः ॥५७॥ ७ भाव में शनि, भौम, ८ भाव में शनि, भौम, शुक्र ये ३ रेखाप्रद हैं। ९ भाव में शनि, १० भाव में भौम, सूर्य, गुरु, शनि, लग्न ११ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न और १२ भाव में गुरु, शुक्र ये २ ग्रह

अष्टकवर्गाध्यायः । ६०७ लग्नमन्दारविच्चन्द्राः सर्वे जीवज्ञभास्कराः । ६ भाव में गुरु, बुध, सूर्य, चंद्र ये रेखाप्रद हैं। ७ भाव में भौम, शनि ये रेखाप्रद हैं। ८ भाव में लग्न, चंद्र, शुक्र, गुरु, भौम, शनि ये रेखाप्रद हैं। ९ भाव में शनि, भौम, सूर्य, बुध, शुक्र ये रेखाप्रद हैं। १० भाव में लग्न, शनि, भौम, बुध, चन्द्र रेखाप्रद हैं। ११ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, शुक्र, शनि ये रेखाप्रद हैं। १२ भाव में गुरु, बुध, सूर्य रेखाप्रद हैं।।५९।। बुधभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह रे. स. ५४ बुधस्याष्टकवर्गः

बु.बृ.शु.श.सू.चं.मं.ल.
११
१२११
१२१०
१०१११०
१११०१०११
१२११११११

[कुण्डली विवरण:

  • १ भाव (सिंह): ।।।। बु ५ बृ
  • २ भाव (कर्क): ।।।। सू. ४
  • ३ भाव (मिथुन): ।।। शु. ३ चं
  • ४ भाव (वृष): ।।।। २
  • ५ भाव (मेष): ।।।।। १
  • ६ भाव (मीन): ।।।। १२
  • ७ भाव (कुम्भ): ।।।।। मं ११
  • ८ भाव (मकर): ।।।। १०
  • ९ भाव (धनु): ।।। ९
  • १० भाव (वृश्चिक): ।।।।। ७ श
  • ११ भाव (तुला): ।७
  • १२ भाव (कन्या): ।।।।। ६] अथ गुरोः भावस्थानप्रदान्ग्रहानाह- गुरोर्लग्रेसुखे जीवलग्नार्कबुधाः धने ।।६०।। गुरु से १।४ भाव में गुरु, लग्न, भौम, सूर्य, बुध ये ५ ग्रह रेखाप्रद हैं।।६०।। चन्द्रशुक्रौ च दुश्क्रिक्ये मन्दार्यार्काःशनिर्व्यये । सुते शुक्रेन्दुलग्नज्ञश्चन्द्रंविनात्वरौ ।।६१।। २ भाव में गुरु, लग्न, भौम, सूर्य, बुध, चंद्र, शुक्र ये ७ ग्रह रेखाप्रद हैं। ३ भाव में शनि, गुरु, सूर्य ये ३ रेखाप्रद हैं। ५ भाव में शुक्र, चंद्र, लग्न, बुध, शनि ये ५ ग्रह रेखाप्रद हैं। ६ भाव में शुक्र, लग्न, बुध, शनि ये ४ ग्रह रेखाप्रद हैं।।६१।। लग्नार्याऽर्केदवोऽस्ते मृतौ जीवार्कभूसुताः । धर्मे शुक्रार्कलग्नेन्दुबुधाः मंदं विनाऽऽयमे ।।६२।। माने गुरुबुधारार्कशुक्रहोरास्तथा विदुः । ७ भाव में लग्न, गुरु, भौम, सूर्य, चंद्र ये रेखाप्रद हैं। ८ भाव में गुरु, सूर्य, भौम ये रेखाप्रद हैं। ९ भाव में शुक्र, सूर्य, चंद्र, बुध ये रेखाप्रद हैं। ११ भाव

६०८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, लग्न रेखाप्रद हैं। १० भाव में गुरु, बुध, सूर्य, शुक्र, लग्न ये रेखाप्रद हैं। शुक्र से १ भाव में लग्न, शुक्र, चंद्र ये ३ रेखाप्रद हैं। २ भाव में भी लग्न, शुक्र, चन्द्र रेखाप्रद हैं।।६२।। गुरुभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह रे. सं. ५६ गुरोरष्टकवर्गः

बृ.शु.श.सू.चं.मं.बु.ल.
१२
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१११०
१०१११०
१११०१११०
११११

[गुरोरष्टकवर्ग चक्रम्]

  • लग्न (१): ।।।। बु ५ वृ
  • द्वितीय (२): ।।।। सू. ४
  • तृतीय (३): ।।। शु. ३ चं
  • चतुर्थ (४): ।।।।।।। ४
  • पञ्चम (५): ।।।।। २
  • षष्ठ (६): ।।।।। १२
  • सप्तम (७): ।।।।।। मं ११
  • अष्टम (८): ।।।। १०
  • नवम (९): ।।। ९
  • दशम (१०): ।।।।।।।। १०
  • एकादश (११): ।।।।।। ८ श
  • द्वादश (१२): ।।।।। ६

अथ भृगोः भावस्थानप्रदान्ग्रहानाह- लग्नशुक्रेन्दवस्ते ते ज्ञार्कारास्ते ज्ञवर्जिताः ।।६३।। ३ भाव में लग्न, शुक्र, चंद्र, बुध, शनि, भौम ये ६ ग्रह रेखाप्रद हैं। ४ भाव में लग्न, शुक्र, चंद्र, भौम, सूर्य ये रेखाप्रद हैं।।६३।। सुतभे लग्नशशिजशशांकायर्किभार्गवाः । ज्ञारौ शून्यं सिताकेंदुगुरुलग्नशनैश्चराः ।।६४।। ५ भाव में लग्न, चंद्र, बुध, गुरु, शनि, शुक्र ये रेखाप्रद हैं। ६ भाव में बुध, भौम रेखाप्रद हैं। ७ भाव में शून्यरेखा। ८ भाव में शुक्र, सूर्य, चंद्र, गुरु, लग्न, शनि ये रेखाप्रद हैं।।६४।। सर्वे रविं बिना शुक्रगुरुमन्दाश्च मानभे । सर्वे कुजेन्दुरवयः क्रमाद्भृगुसुतस्य च ।।६५।। ९ भाव में चंद्र, भौम, गुरु, बुध, शुक्र, शनि, लग्न ये रेखाप्रद हैं। १० भाव में शुक्र, शनि रेखाप्रद हैं। ११ भाव में सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न ये रेखाप्रद हैं। १२ भाव में भौम, चंद्र, सूर्य ये रेखाप्रद हैं।।६५।।

४. अष्टकवर्ग, सुदर्शन चक्र, शान्ति-विधान, ग्रह-जाप एवं होरा शास्त्र उपसंहार

अष्टकवर्गाध्यायः । ६०९ भृगुभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह रे. सं. ५२ भृगोरष्टकवर्गः

शु.शं.सू.चं.मं.बु.बृ.ल.
११
१२
१०
११११११
१०१२
११
१०११११
१११२

अथ शनेः भावस्थानप्रदान्ग्रहानाह- शनेः रवितनू सूर्यो लग्नेन्दुकुजसूर्यजाः । लग्नाकौ जीवमन्दाराः सर्वे सूर्य बिना क्षते ॥६६॥ शनि से १ भाव में सूर्य, लग्न ये दोनों रेखाप्रद हैं। २ भाव में सूर्य। ३ भाव में लग्न, चंद्र, भौम, शनि रेखाप्रद हैं। ४ भाव में लग्न, सूर्य रेखाप्रद हैं। ५ भाव में गुरु, शनि, भौम रेखाप्रद हैं। ६ भाव में चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न रेखाप्रद हैं।।६६।। अंर्कोऽर्कजौ बुधोऽर्कारितनुज्ञाः सकलाश्चताः । कुजज्ञगुरुशुक्राश्च क्रमात्स्थानमिदं विदुः ॥६७॥ ७ भाव में सूर्य। ८ भाव में सूर्य, बुध रेखाप्रद हैं। ९ भाव में बुध। १० भाव में सूर्य, भौम, लग्न, बुध रेखाप्रद हैं। ११ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न ये रेखाप्रद है। १२ भाव में भौम, बुध, गुरु, शुक्र रेखाप्रद हैं।।६७।। शनेः भावस्थानप्रदान्ग्रहानाह रे सं. ३९ शनेरष्टकवर्गः

श.सू.चं.मं.बु.बृ.शु.ल.
११
१११११२
१११०१०१२
१११११०
१०१२१२११
११

६१० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ लग्नस्य भावस्थानप्रदान्ग्रहानाह- अथ स्थानं प्रवक्ष्यामि लग्नस्य द्विजपुंगव ॥६८॥ हे मैत्रेय! रेखा को ही स्थान कहते हैं। लग्न के रेखाप्रद ग्रहों को कह रहा हूँ॥६८॥ आर्किज्ञशुक्रगुर्वाराः सौम्य देवेज्यभार्गवाः । हित्वा सौम्यगुरु शेषाः सूज्ञेज्यभृगुसूर्यजाः ॥६९॥ लग्न भाव में शनि, बुध, शुक्र, गुरु, भौम ये ५ ग्रह रेखाप्रद हैं। २ भाव में बुध, गुरु, शुक्र ये रेखाप्रद हैं॥६९॥ तथा जीवभृगुवुधौ सर्वे शुक्रं बिना क्षते । जीव एकस्तथा द्यूने मृतौ सौम्यभृगू तथा ॥७०॥ ३ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, शुक्र, शनि, लग्न रेखाप्रद हैं। ४ भाव में सूर्य, बुध, गुरु, शुक्र, शनि रेखाप्रद हैं। ५ भाव में गुरु, शुक्र रेखाप्रद हैं। ६ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शनि लग्न रेखाप्रद हैं।

अष्टकवर्गाध्यायः । ६११ करणं विन्दुवत्प्रोक्तं स्थानं रेखा तथोच्यते । मुनिदिग्वसुवेदादिगिष्वद्र्यष्टनवेषवः ॥७२॥ रूद्रार्का वर्गाणामेषाद्द्विविषयेऽष्टवायवः । पंक्तिस्वरेषवः सूर्याद्गिर्गुणा प्रोच्यते बुधैः ॥७३॥ करण का स्वरूप विन्दु (शून्य) का है और स्थान का स्वरूप रेखा के (।) सदृश है। मेषादि राशियों का क्रम से ७।१०।८।४।१०।५।७।८।९।५।११।१२ ये गुणक हैं। और सूर्यादि ग्रहों को ५।५।८।५।१०।७।५ ये गुणक हैं॥७२- ७३॥ राशिगुणकबोधकचक्रम्।

मे.वृ.मि.क.सिं.कं.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.राशयः
१०१०१११२गुणकः
ग्रहगुणकबोधकचक्रम्।
सू.चं.मं.बु.वृ.शु.श.ग्रहाः
:---::---::---::---::---::---::---::---:
१०.५गुणकः
करणस्थान लेखनविधिः-
नव रेखालिखेदूर्ध्वास्तिर्यग्रेखास्त्रयोदश ।
तदा तु षण्णवतिः स्युः ग्रहयोगे पदानि च ॥७४॥
नव रेखा ऊर्ध्वाधर (खड़ी) और तेरह रेखा आड़ी (तिरछी) लिखने से ९६
कोष्ठ का चक्र ग्रहों के योग के लिये बन जाते हैं॥७४॥
तस्याशुभस्य विन्यस्य चाष्टवर्गं ततः क्रमात् ।
त्रिकोणेकाधिपत्यस्य कुर्याच्छोधनकं बुधः ॥७५॥
पूर्वोक्त अशुभ सूर्य चन्द्र चतुर्थ और पंचम में सम्पर्क रखनेवाले पूर्वोक्त पापग्रहों
का अष्टवर्ग रखकर त्रिकोण और एकाधिपत्य शोधन करें। त्रिकोण स्थान ३ होते
हैं अर्थात् १।५।९ इसी का संशोधन करना॥७५॥
इति पाराशर होरायामुत्तरभागे प्रथमोध्यायः।