बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अनुपातोंऽन्तरे वक्रं त्यागेऽष्टांशविहीनकाः । मंदायां दशभागोना वस्वंशोना कराःस्मृताः ।। १५ ।। वक्र के अन्त्य में हो तो रश्मि में ८ से भाग देने से लब्ध स्पष्ट रश्मि होती है, वक्र के मध्य में हो तो अनुपात द्वारा रश्मि लाना चाहिये। रश्मिपति मंदगति हो तो रश्मि का दशांश पूर्व रश्मि में घटाने से, यदि मंदतर गति हो तो अष्टमांश हीन करने से ।।१५।। तथा शीघ्रतरायां च वेदांशोनाः कराः स्मृताः । अंगाशोनाश्च शीघ्रायां केचिदेवं वदन्ति हि ।। १६ ।। शीघ्रगति हो तो छठाँ भाग हीन करने से और शीघ्रतर गति हो तो चतुर्थांश हीन करने से स्पष्ट रश्मि होती है ऐसा कुछ ऋषियों का मत है।।१६।। अथ ग्रहाणां अष्टधा गतिः- वक्रानुवक्रा विकला शीघ्रा शीघ्रतरागतिः । वृद्धिहीने तु शिष्टे द्वे वर्जनीये समासमा ।। १७ ।। वक्र, अनुवक्र, विकला, शीघ्रगति, शीघ्रतरा, मंदगति, मंदतरा, समासमा ये आठ प्रकार की ग्रहों की गति होती हैं। शीघ्रतर गति वृद्धि हीन होने से मंदगति और शीघ्रगति वृद्धिहीन होने से अतिमंदतर होती है।।१७।। योगविशेषात्ह्रासवृद्धिः । योगेषु ये ग्रहाः प्रोक्तास्तेषां योगे च रश्मयः । पापसौम्यरिमित्राणां योगे हानिश्च कीर्त्तिताः ।। १८ ।। उच्चादिषु पूर्वोक्ताः पापो बलवशाद्भवेत् ।। १९ ।। पूर्व में जो राजयोग कहे गये हैं उनमें (राजयोग कारक और दरिद्र योग कारक) राजयोग कारक ग्रहों के रश्मियों के योग में दरिद्र योग कारक ग्रहों के रश्मियों को घटा देने से शेष राजयोग कारक रश्मि होती है।। १८ ।। इसी प्रकार पापग्रहों की उच्चादि नव स्थान पर्यन्त रश्मियों को उनके बल के अनुसार न्यूनाधिक करने से उनकी स्पष्ट रश्मि होती है।।१९।।