बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ रश्मिफलवर्णनाध्यायः । ६३९ द्विग्रहादियोगे निर्णयः- द्विग्रहादिषु योगेषु ग्रहभावकलाहताः । ग्रह गति संज्ञानुरूपेण फलानां निर्णयः स्मृताः ।।२०।। दो तीन आदि ग्रहों के योग में ग्रहों के भाव के फलादि को उनके रश्मियों से गुण देना यदि साठ ६० से अधिक हो तो ६० से भाग देने से लब्धि स्पष्ट रश्मि होती है। ग्रहों के रश्मियों का फल उनके गति के अनुसार ही होता है।।२०।। इष्टकष्टरश्मेः प्रयोजनम् – इष्टकष्टबलसंगुणास्ततस्तत्करानथ च संयुतास्तुतान्। निश्चितार्थमखिलं समीक्ष्यतत्रस्तुतं तु सकलं वदेद्बुधः।।२१।। ग्रहों के इष्ट कष्ट बल से उनके रश्मियों को गुणकर उसमें ६० से भाग देने से ग्रहों की इष्ट और कष्ट रश्मि होती है। इन सम्पूर्ण रश्मियों को देखकर ग्रहों के फलों को कहना चाहिये।।२१।। एकतः पंचरश्मियोग फलम् – एकादि पंचकं यावद्दरिद्रा भृशदुःखिताः । नीचानां दासतां याता अपि जाता कुलोत्तमे ।।२२।। एक से पांच रश्मि योग में उत्पन्न पुरुष अत्यंत दुःखी होता है। यदि उत्तम कुल में उत्पन्न पुरुष हो तो नीचों की नौकरी करता है।।२२।। दशरश्मियोग फलन् – परतो दशकं यावत्केवलं जठराय वै । निःस्वाः कदाचिद्दासाश्च भारवाहाः कदाचन । स्त्रीपुत्रगृहहीनाश्च वंशायोग्यक्रियारताः ।।२३।। ६ से १० तक रश्मियोग हो तो पुरुष केवल पेट भरनेवाला, निर्धन, कभी दासता करनेवाला, कभी बोझा ढोने का काम करनेवाला, स्त्री पुत्र से हीन और कुल के विपरीत कार्य करनेवाला होता है।।२३।। एकादशतो त्रयोदशपर्यन्तं रश्मिफलम् – एकादशेऽल्पपुत्रस्यादल्पस्वं स्त्रीविमानितः । विभ्रति कृच्छ्रेण निजं स्वल्पं च कुटुम्बकम् ।।२४।। ग्यारह रश्मियोग हो तो अल्पपुत्र, अल्पधन और स्त्री से अनादर और थोड़े कुटुम्ब को भी कष्ट से पालन करनेवाला होता है।।२४।।