बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४० वृहतपाराशरहोराशास्त्रम् । द्वादशे निर्धनः मूर्खाधूर्ताः सत्त्वविनाशकाः । त्रयोदशे च चौराः स्युर्निर्धनाः कुलपांशवाः ॥२५॥ बारह रश्मियोग हो तो निर्धन, मूर्ख, सत्त्वहीन होता है, तेरह रश्मियोग में चोर निर्धन और कुलकलंक होता है॥२५॥ चतुर्दशतः पञ्चदश रश्मि फलम् - विद्वांश्चतुर्दशे धर्मेरतो मर्षी धनार्जकः । कुटुम्बभरणे सक्तः कुलयोग्यक्रियो भवेत् ॥२६॥ चौदह रश्मियोग हो तो धार्मिक, क्रोधहीन, धन को पैदा करनेवाला, कुटुम्ब के भरण पोषण में समर्थ और कुलयोग्य क्रिया करनेवाला होता है॥२६॥ रश्मिभिः पंचदशभिरेवं पूर्वोक्त गुणयुतोऽपिसन् । स्ववंशमुख्यो जनवानित्याह भगवान्मुनिः ॥२७॥ पंद्रह रश्मियोग में पूर्वोक्त गुणों से युक्त होते हुए भी अपने कुल में प्रधान और धनी होता है ऐसा पराशर मुनि ने कहा है॥२७॥ षोडशतः द्वाविंशतिपर्यन्त रश्मियोग फलम् - आविंशतेः कुलेशानां बहुभृत्यः कुटुम्बिनः । कीर्त्तिमंतश्च पूर्णाश्च स्वजनेन च षोडशात् ॥२८॥ १६ से २० तक रश्मियोग हो तो कुल को पालन करनेवाला, बहुत से नौकरों से युक्त, कुटुम्बी, कीर्त्ति से युक्त और स्वजनों से पूर्ण होता है॥२८॥ एकविंशति विख्यातः पंचाशज्जनपोषकः । दानशीलः कृपायुक्तो द्वाविंशे लोभ संयुतः ॥२९॥ २१ रश्मि हो तो बड़ा प्रसिद्ध और पचासों लोगों का पालन करनेवाला होता है और २२ रश्मियोग में दानशील और कृपालु होता है॥२९॥ त्रिंशत्पर्यन्तरश्मिफलम् - धनवानल्प शत्रुश्च प्रभुः स्वल्पगुणो भवेत् । त्रयोविंशे च मुख्यश्च विद्याहीनो धनीसुखी ॥३०॥ रश्मियोग २३ हो तो मनुष्य धनी, अल्प शत्रु, समर्थ और अल्पगुणी होता है॥३०॥