भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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वर्गभेदाध्यायः ६७ अथ वर्गभेदानाह- वर्गभेदानहं वक्ष्ये मैत्रेय त्वं विधारय। षड्वर्गाः सप्तवर्गाश्च दिग्वर्गा नृपवर्गाः॥४०॥ हे मैत्रेय ! मैं वर्गभेद को कहता हूँ, उसे तुम सुनो॥ षड्वर्ग, सप्तवर्ग, दशवर्ग और षोडश वर्ग होते हैं॥४०॥ भवन्ति वर्गसंयोगे षड्वर्गे किंशुकादयः। द्वाभ्यां किंशुकनामा च त्रिभिर्व्यञ्जनमुच्यते॥४१॥ षड्वर्ग में दो-तीन आदि वर्गों के संयोग से किंशुक आदि संज्ञाएँ होती हैं। यथा दो वर्ग में ग्रह हो तो किंशुक, तीन के संयोग से व्यञ्जन॥४१॥ चतुर्भिश्चामराख्यं च छत्रं पञ्चभिरेव च। षड्भिः कुण्डलयोगः स्यान्मुकुटाख्यं च सप्तभिः॥४२॥ चार के संयोग से चामर, पाँच के संयोग से छत्र और छः वर्गों के संयोग से कुण्डल नाम होता है। सप्तवर्ग में छः वर्ग तक तो पूर्वोक्त ही होते हैं, किन्तु सात वर्ग के संयोग से मुकुट होता है॥४२॥ सप्तवर्गेऽथ दिग्वर्गे पारिजातादिसंज्ञकाः। पारिजातं भवेद्द्वाभ्यामुत्तमं त्रिभिरुच्यते॥४३॥ दशवर्ग में दो वर्ग के संयोग से पारिजात, तीन वर्ग के संयोग से उत्तम॥४३॥ चतुर्भिर्गोपुराख्यं स्याच्छरैः सिंहासनं तथा। पारावतं भवेत्षड्भिर्देवलोकं तु सप्तभिः॥४४॥ चार वर्ग के संयोग से गोपुर, पाँच वर्ग के संयोग से सिंहासन, छः वर्ग के संयोग से पारावत, सात वर्ग के संयोग से देवलोक॥४४॥ वसुभिर्ब्रह्मलोकाख्यं नवभिः शक्रवाहनम्। दिग्भिः श्रीधामयोगं स्यादथ षोडश वर्गके॥४५॥ आठ वर्ग के संयोग से ब्रह्मलोक, ९ वर्ग के संयोग से शक्रवाहन और १० वर्ग के संयोग से श्रीधाम योग होता है॥४५॥