भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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६८ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् भेदकं तु भवेद्द्वाभ्यां त्रिभिः स्यात्कुसुमाख्यकम्। चतुर्भिर्नाकपुष्पं स्यात्पञ्चभिः कन्दुकाह्वयम्।।४६।। षोडश वर्ग में २ वर्ग संयोग से भेदक, ३ वर्ग के संयोग से कुसुम, चार वर्ग के संयोग से नागपुष्प, पाँच वर्ग के संयोग से कंदुक।।४६।। केरलाख्यं भवेत्षड्भिः सप्तभिः कल्पवृक्षकम्। अष्टभिश्चन्दनवनं नवभिः पूर्णचन्द्रकम्।।४७।। ६ वर्ग के संयोग से केरल, ७ वर्ग के संयोग से कल्पवृक्ष, आठ वर्ग के संयोग से चन्द्रवन, ९ वर्ग के संयोग से पूर्णचन्द्र।।४७।। दिग्भिरुच्चैःश्रवा नाम रुद्रैर्धन्वन्तरिर्भवेत्। सूर्यकान्तं भवेत्सूर्यैर्विश्वैः स्याद्विद्रुमाह्वयम्।।४८।। दश वर्ग के संयोग से उच्चैःश्रवा, ग्यारह वर्ग के संयोग से धन्वन्तरि, बारह वर्ग के संयोग से सूर्यकान्त, तेरह वर्ग के संयोग से विद्रुम।।४८।। शक्रसिंहासनं शक्रैर्गोलोकं तिथिभिर्भवेत्। भूपैः श्रीवल्लभाख्यं स्याद्वर्गभेदैरुदाहृता।।४९।। चौदह वर्ग के संयोग से सिंहासन, पंद्रह वर्ग के संयोग से गोलोक और सोलह वर्ग के संयोग से श्रीवल्लभ नाम होता है।।४९।। स्वोच्चमूलत्रिकोणस्वभवनाधिपतेः तथा। स्वारूढात्केन्द्रनाथानां वर्गा ग्राह्या सुधीमता।।५०।। जो ग्रह अपने उच्चराशि में, अपने मूलत्रिकोण राशि में, अपने राशि में और आरूढ़ लग्न से केन्द्रपतियों का वर्ग लेना चाहिये।।५०।। अस्तंगता ग्रहजिता नीचगा दुर्बलास्तथा। शयनादिगतादुस्था उत्पन्ना योगनाशकाः।।५१।। जो अस्त हों, युद्ध में पराजित हों, अपने नीचराशि में हों, दुर्बल हों, शयनादि दुष्ट अवस्था में हों तो उनका वर्ग अशुभ होता है।।५१।। विशेष- गृह, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश और त्रिंशांशक को षड्वर्ग कहते हैं। इनके साथ सप्तमांश को मिला देने से सप्तवर्ग होता है और इसमें दशमांश, षोडशांश, षष्ठांश को ले लेने से दशवर्ग होता है, शेष षोडशवर्ग होते हैं।