भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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षोडशवर्गविवेकाध्यायः ६९ किंशुकादि सप्तवर्गजसंज्ञाबोधकचक्रम्—

किंशुकव्यंजनचामरछत्रकुंडलमुकुट
पारिजातादि दशवर्गजसंज्ञाबोधकचक्रम्—
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पारिजातउत्तमम्गोपुरम्सिंहासनम्पारावतम्देवलोक
षोडशवर्गजसंज्ञाबोधकचक्रम्।
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भेदकम्कुसुमाख्यम्नागपुष्पम्कंदुकाख्यम्केरलाख्यम्कल्पवृक्षम्
उदाहरण— पूर्वोक्त उदाहरणों में लग्न सप्तवर्गों में २ वर्ग में है, अतः
किंशुक संज्ञा हुई। दशवर्ग के अनुसार २ वर्ग में है, अतः पारिजात
संज्ञा में है और षोडशवर्ग के अनुसार ४ वर्ग में है, अतः नागपुष्प संज्ञा
हुई। इसी प्रकार प्रत्येक ग्रहों की संज्ञायें बनानी चाहिए।
इति पाराशरहोरायां सुबोधिन्यां पञ्चमः।
अथ षोडशवर्गविवेकाध्यायः
अथ षोडशवर्गेषु चिन्ता लग्नं वदाम्यहम्।
लग्नं देहस्य विज्ञानं होरायां सम्पदादिकम्॥१॥
अब मैं षोडश वर्गों से विचारणीय विषयों को कह रहा हूँ। लग्न
से शरीर सम्बंधी शुभ-अशुभ का विचार करना चाहिए, होरा से द्रव्य
का।।१।।