बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टकवर्गफलाध्यायः । ६५५ रविः पिता शशी माता भ्राता भौमो बुधः सुहृत् । मातुलेयः स्मृतो जीवो ज्ञानपुण्ये स्त्रियः सितः ॥५॥ सूर्य पितृ कारक, चन्द्रमा मातृकारक, भौम भ्रातृकारक, बुध मित्र और मातुल (मामा) कारक, गुरु विद्या और पुण्य (कर्म) कारक और शुक्र स्त्री कारक हैं ॥५॥ एषामृक्षे च तत्काले मरणं कुरुते शनिः । आदित्याष्टकवर्गं च निक्षिप्याकाशचारिषु ॥६॥ इनके नक्षत्रों में जब शनि आता है तो इन लोगों को कष्ट कारक होता है। सूर्य के अष्टम वर्ग को ग्रह सहित स्थापनकर विचार करे॥६॥ अर्कस्थितस्य नवमो राशिः पितृगृहं स्मृतम् । तद्राशिफल संख्याभिवर्द्धयेद्योगपिंडकम् ॥७॥ सूर्य से नवम राशि पिता की होती है, उस नवम राशि में जो रेखा की संख्या हो उससे योग पिण्ड को गुणकर॥७॥ सप्तविंशोद्धृतं शेषं नक्षत्रं याति भानुजम् । तस्मिन्काले पितृक्लेशो भवतीति न संशयः ॥८॥ २७ से भाग देने से जो शेष बचे वह अश्विन्यादि नक्षत्र की संख्या होती है उस नक्षत्र पर जब शनि जाता है तो पिता को कष्ट होता है॥८॥ तत्त्रिकोणगते वापि पितापितृसमोऽपिवा । मरणं तस्य जानीयाद्दशाछिद्रेषु कल्पयेत् ॥९॥ अथवा इसके त्रिकोण नक्षत्र में जब शनि होता है तब पिता और पिता के सदृश लोगों को कष्ट होता है। यदि उस समय पापग्रह की दशा हो तो मृत्यु होती हैं अन्यथा कष्ट मात्र होता है॥९॥ अर्कात्तु तुर्यगेराहौ मंदे वा भूमिनंदने । गुरुशुकेक्षणमृते पितृहा जायते नरः ॥१०॥ सूर्य से चौथे स्थान में राहु, शनि, भौम में से कोई हो और उसे गुरु शुक्र न देखते हों तो पिता का नाश होता है॥१०॥