भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 665, कुल 800 में से

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पृष्ठ 665

अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६५३ से भाग देना लब्ध कलादि फल को द्वितीय भाव के ध्रुवांक से गुणाकर यदि उनमें ग्रह हो तो उसके ध्रुवांक से गुणकर।।२९।। भावरश्मिभिराहन्यात्सप्तभिश्च विभजयेत् । मूलरश्मिसमूहेन शिष्टं हन्यात्तथैवतान् ।।३०।। उसे दूसरे भाव के स्वामी के रश्मि से गुणाकर सात से भाग देने से जो अंक प्राप्त हो वह-भारणीय कुटुम्ब की संख्या और शेष को मूलरश्मि समूह से गुणकर।।३०।। इष्टानिष्टफलाभ्यां च हत्वांतरमथद्वयोः । सप्तविंशतिभिर्हत्वा सप्तभिश्च विभजयेत् ।।३१।। गुणनफल में भाव स्वामी के इष्ट फल से गुणन करके एवं भाव स्वामी के कष्ट बलांकों से मूलरश्मि समूह को गुणन कर दोनों के अन्तर को २७ से गुण देने से कलादि फल को ७ से भाग देने से जो आवे वह स्त्रियों की संख्या होती है।।३१।। भरणीय कुटुम्बानां पुंस्त्रियस्तत्समाविदुः । राशीन् हित्वातु लग्नादि भावभागादिकान् ।।३२।। राशियों को छोड़कर लग्नादि भावों के अंशादि अलग-अलग। अपने अपने स्वामियों के रश्मियों से गुणन करने से जो आवे उसे भावभागादि कहते हैं।।३२।। गुणयेद्रश्मिभिः स्वैश्च भावभागादयोविदुः । कलीकृत्य भलिप्ताभिर्विभज्याप्तं फलं ततः ।।३३।। इसका कलापिंड बनाकर दो जगह स्थापित करे उसमें राशि लिप्ता से भाग देने से जो फल प्राप्त हो उसे भावफल कहते हैं और दूसरे स्थान में १२ से भाग देने से जो फल हो उसे भाव साधन फल कहते हैं।।३३।। प्रकारांतर से भावफल साधन- सूर्यभक्तावशिष्टं तु भावानां साधनं विदुः । राशीन् हित्वा तंतो लिप्ताखखनेत्रविभाजिताः ।।३४।। राशिको छोड़कर अंशादि की कला बनाकर उसमें २०० से भाग देना।।३४।।