भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 666

६५४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । साधनघ्ना विभक्ताश्च वर्गणाभिः फलाहताः । उच्चादिवृद्धिहानिं च कुर्यात्तत्संख्यकाभवेत् ॥३५॥ लब्ध को पूर्व साधित भाव साधन से गुणकर अपने ध्रुवांक में भाग देना और पूर्व प्रतिपादित भाव साधन से गुण कर अपने ध्रुवांक में भाग देना पुनः इसे पूर्वसंपादित फल से गुण देने से जो संख्या प्राप्त हो वह कुटुम्बपोषण की संख्या होती है॥३५॥ अष्टकवर्गफलाध्यायः । तत्रादावष्टकवर्गे विचारणीयः- आत्मभावशक्तिश्च पितृचिन्ता रवेः फलम् । मनोवृत्तिप्रसादश्च मातृचिन्तामृगांकतः ।।१।। आत्मा, प्रभाव, शक्ति और पिता का फल सूर्य से विचार करना चाहिये मन, वृत्ति, प्रसन्नता और माता का विचार चन्द्रमा से करना चाहिये।।१।। भ्रातृसत्वं गुणं भूमिंभौमेन च विचारयेत् । वाणिज्यकर्मवृत्तिश्च बुधेन तु विचिन्तयेत् ।।२।। भाई, बल, गुण, भूमि का विचार भौम से करना चाहिये। वाणिज्य कर्म वृत्ति का बुध से करना चाहिये।।२।। गुरुणा देहपुष्टिं च विद्यापुत्रार्थसंपदः । भृगोर्विवाहकर्माणि भोगस्थानं च वाहनम् ।।३।। शरीर की पुष्टि, विद्या, पुत्र, धन संपत्ति का विचार गुरु से करना चाहिये। शुक्र से विवाह, संभोग, वाहन, वेश्या, स्त्री का विचार करना चाहिये।।३।। वेश्यास्त्रीजनगात्राणि शुक्रेणैवनिरीक्षयेत् । आयुष्यं जीवनोपायं दुःखशोकमहद्भयम् । सर्वक्षणं च मरणं मंदेनैव निरीक्षयेत् ।।४।। आयुष्य, जीवन, दुःख, शोक आदि का विचार शनि से करना चाहिये।।४।।