बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः । ६६९ ३७ रेखा में धन का लाभ और ३८ रेखा में सुख और धन का लाभ होता है। ३९ रेखा में द्रव्य और रत्न का लाभ।।८०।। धनवान्कीर्त्तिमांश्चैव चत्वारिंशतिवर्धते । अतऊर्ध्वं यशोऽर्थाप्तिः पुण्यश्रीरूपचीयते ।।८१।। और ४० रेखा में धन और कीर्त्ति की वृद्धि होती है। इससे अधिक रेखा में यश धन, पुण्य आदि की वृद्धि होती है।।८१।। इतिपाराशरहोरायामुत्तरार्धेऽष्टकवर्गप्रकरणम्। इति पाराशर होरायामुत्तरर्धेलोकयात्रा वर्णनंनाम पंचमोध्यायः।।५।। षष्ठोऽध्यायः । भाग्योत्कर्षं भाग्यहानिं कुटुम्बं दुःखं हानिं शत्रुमायं व्ययंच । उद्वाहं स्त्रीपुत्रलाभादिकं च ब्रूयादेवं चाब्दचर्या क्रमेण ।।१।। भाग्यवृद्धि भाग्यहानि, पोषणीय समूह, कष्ट, हानि, शत्रु, आय, व्यय, विवाह, स्त्री, पुत्र, लाभादिक का फल कहते हैं।।१।। अब्दमासदिनचर्याविधानं वक्ष्यते खलु मया सुमते ते । वक्ष्यमाणविधिना परमायुः सम्यगत्र विदधीत महात्मन् ।।२।। हे मैत्रेय! तुम्हें मैं वर्षचर्या, मासचर्या, दिनचर्या का विधान निश्चय कर कहता हूँ। इसके जानने के लिये सम्यक् रीति से आयु का ज्ञान आवश्यक है।।२।। भावानां फल समयः। भावानां साधनं हत्वा दृष्टिभिश्च वलेन च । षड्वर्गादिपतीनां च भावे पृथक्-पृथक् ।।३।। भावों को अपनी-अपनी दृष्टि और भाव बल से गुणा कर गुणनफल में।।३।। तेषां च दृग्वलानां च संहत्या भाजयेदथ । स्वामिदृष्टिस्थितानां तु काले भावफलं विदुः ।।४।। उन उन भावों के स्वामियों के षड्बल, दृष्टि के योग से भाग देने से लब्ध वर्षादिक में भावों के फल होते हैं।।४।।