बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७० वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । ज्ञानसंभवकालस्तु जन्मकालाद्वला यदा । लग्नादिव्ययपर्यन्ता भावाः काले तथा विदुः ॥५॥ जो भाव अपने स्वामी से दृष्ट हो और स्वामी बली हो तो उसके दशा में फल होता है। यदि अपने स्वामी से न देखा जाता हो तो उक्त समय में लग्न से व्ययपर्यन्त भावों में जो अधिक बली हो उसके स्वामी के दशा में उक्तभाव का फल होता है।।५।। अथ शुभपापभेदाद्भावफले विशेषः- लग्नाषड्वर्गहोराणां भोक्तारः पतयः स्मृताः । त्रिपंचवेददिक्सप्तमुनिरामांशके फलम् ॥६॥ लग्न में जो षड्वर्ग कहा गया है उसके (अर्थात् ६ वर्गों के स्वामी) पृथक्- पृथक् अपनी-अपनी दशा में फल को देते हैं।।६। शुभग्रहास्तुद्रष्टारः स्थानदाःसकलाग्रहाः । युक्ताः तदातु सद्भावाः संज्ञानुफलदास्तदा ।।७।। किन्तु क्रम से ३।५।३।१०।७।७ ३ अंशों में फल को देते हैं। देखने वाले शुभग्रहों का ही शुभ फल होता है पापग्रहों का नहीं होता है। रेखा में दोनों का शुभाशुभ फल होता है।।७।। पापात् हानिकरान् हित्वा स्वोच्चकोणसुहृत्स्थितान्। तद्राशिर्यस्य शत्रुंर्वा नीचयोर्वा ग्रहो यदि ।।८।। हानिं कुर्यात्तदातस्य दृष्टियोगानुपातः । भावों में जो ग्रह पाप या शुभ अपने उच्च नीच मूलत्रिकोण आदि में शत्रु मित्रादि की राशि में हों उसी क्रम से वह फल देते हैं।।८।। अथ कारक विचारः- उद्वाहकारकौ चन्द्रशुकौ ज्ञोवातपोऽथवा ।।९।। चन्द्रमा और शुक्र विवाह कारक होते हैं अथवा बुध और गुरु भी विवाह कारक होते हैं।।९।। शनिर्मृतिकरो भौमरवी नीचासतीपती । गुरुः शुभकरः पुत्रे कुजो भ्रातरि शत्रुमे ।।१०।।