भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 683

षष्ठोऽध्यायः । ६७१ शनि मृत्युकारक होता है, भौम नीच (कुलटा) कारक और सूर्य सती (पतिव्रता) कारक है। पांचवे भाव में गुरु शुभ फल देने वाला होता है, भौम तीसरे स्थान में, छठें स्थान में।।१०।। मदेश्राये शुभाः सर्वे स्वोच्चगौ भौमसूर्यजौ । भाग्येऽशुभाः शुभा पापा अशुभाःस्वपतिविना ।।११।। शनि शुभफल दायक होता है और एकादश भाव में सभी शुभ फलद होते हैं, भौम शनि अपनी उच्चराशि में हो तो शुभद होता है। भाग्यभाव में पापग्रह अशुभ और शुभग्रह शुभद होता है किन्तु पापग्रह यदि उस भाव का स्वामी हो तो शुभद होता है।।११।। अथ दृष्टिबलात् भावफलस्य व्यवस्था- पूर्वभामे समुद्दिष्टदृग्बलेन फलानि तु । विरुद्धानि परित्यज्य समीचीनानि संग्रहेत् ।।१२।। पूर्वभाम में दृष्टिबल से कहे हुये फल में विरुद्ध फलों का त्यागकर शुभफलों का इस प्रकरण में उपयोग करना।।१२।। स्त्रीपुरुषयोः स्वभाव विचारः ग्रहराशिस्वभावेन पुंस्त्रियोराशिमेव च । स्वभावं च वदेद्बुध्या देशकालकुलानुगः ।।१३।। मनुष्यों के स्वभाव गुण को राशि और ग्रहों के अनुसार देशकाल और कुल के अनुसार ही कहना चाहिये।।१३।। स्वभावे ह्रासवृद्धिः। तेषामिष्टफलेवृद्धिस्त्वशुभाख्य फलादयः । अन्यथा त्वसदेवस्यात्तस्यतस्मान्मृतौफलम् ।।१४।। जिस भाव का इष्टबल अधिक हो उसका शुभफल उत्तरोत्तर अधिक और जिसका कष्टबल अधिक हो उसका अशुभ फल उत्तरोत्तर अधिक होता है।।१४।। रविस्तु पाचको ज्ञेयश्चन्द्रमा बोधकः सदा । पाचको बोधकश्चैव कारको वेधकः क्रमात् ।।१५।। सूर्य पाचक होता है और चन्द्रमा बोधक होता है और सूर्य को कारक तथा चन्द्रमा को वेधक भी कहते हैं।।१५।।