भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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६७२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । सूर्यादिग्रहाणां स्थान संबन्धात्पाचकादिग्रहाः । रव्यादीनां च विज्ञेया मंदारेज्यसितास्तथा । शुक्रारमंदरवयो रवीन्दुशनिचन्द्राजाः ।।१६।। चन्द्रेज्यसितभौमाश्च मंदारेन्दुदिनेश्वराः । भौमज्ञसूर्यमंदाः स्युः सितेन्दुगुरुभूमिजाः ।।१७।। षट्सप्तनवरुद्रेषु सप्तनंदभवत्रिषु । द्विषडायव्ययेष्वेवं द्विवेदेन्द्रियवह्निषु ।।१८।। षट्पंचसप्तरिष्फेषु द्विषड्व्ययचतुर्ष्वपि । त्रिरुद्रषट्सप्तमेषु स्थिताः स्थानेषु ते ग्रहाः ।।१९।। सूर्य से ६।७।९।११ स्थानों में क्रम से शनि, भौम, गुरु, शुक्र पाचक बोधक, कारक और वेधक होते हैं। एवं चन्द्रमा से ७।९।११।३ स्थानों में शुक्र, भौम, शनि, सूर्य, भौम से २।६।११।१२ स्थानों में सूर्य, चन्द्र, शनि, बुध से २।४।५।३ स्थानों में चन्द्र, गुरु, शुक्र, भौम, गुरु से ६।५।७।१२ स्थानों में शनि, भौम, चन्द्र, सूर्य, शुक्र से २।६।१२।४ स्थानों में भौम, बुध, सूर्य, शनि और शनि, और शनि से ३।११।६।७ स्थानों में शुक्र, चन्द्र, गुरु, भौम पाचक बोधक, कारक और वेधक होते हैं।।१६-१९।। पाचकाद्यास्तुत्वारः सूर्यादिभ्यः क्रमादिह । पीडर्क्षेवाप्यपीडर्क्षे केन्द्रे लग्नं विना तथा ।।२०।। सूर्यादि ग्रहों की शत्रुराशि, अपीडर्क्षे (मित्रराशि) में लग्न को छोड़कर केन्द्र में गये हुये सभी पाचक आदि ग्रह बली होते हैं।।२०।। षट्सप्तधर्मकर्मायमृतिष्वेव गताः क्रमात् । पाचकाद्याश्चतुर्थे च बलवंत समीरिताः ।।२१।। तथा लग्न से ६।७।९।१०।११।८।४ इन स्थानों में गये हुये सूर्यादि पाचक आदि क्रम से बली होते हैं।।२१।। कारको मंदफलदो वेधको विघ्नकृत्स्मृतः । बोधकः शीघ्रफलदः पाचको विफलप्रदः ।।२२।। कारक ग्रह न्यून फल वेधकं अपने भाव के फल की हानि करने वाला, बोधक ग्रह अपने भाव के फल को शीघ्र देने वाला तथा पाचक ग्रह अपने भाव संबंधित फल को विफल करने वाला होता है।।२२।।