बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
६७२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । सूर्यादिग्रहाणां स्थान संबन्धात्पाचकादिग्रहाः । रव्यादीनां च विज्ञेया मंदारेज्यसितास्तथा । शुक्रारमंदरवयो रवीन्दुशनिचन्द्राजाः ।।१६।। चन्द्रेज्यसितभौमाश्च मंदारेन्दुदिनेश्वराः । भौमज्ञसूर्यमंदाः स्युः सितेन्दुगुरुभूमिजाः ।।१७।। षट्सप्तनवरुद्रेषु सप्तनंदभवत्रिषु । द्विषडायव्ययेष्वेवं द्विवेदेन्द्रियवह्निषु ।।१८।। षट्पंचसप्तरिष्फेषु द्विषड्व्ययचतुर्ष्वपि । त्रिरुद्रषट्सप्तमेषु स्थिताः स्थानेषु ते ग्रहाः ।।१९।। सूर्य से ६।७।९।११ स्थानों में क्रम से शनि, भौम, गुरु, शुक्र पाचक बोधक, कारक और वेधक होते हैं। एवं चन्द्रमा से ७।९।११।३ स्थानों में शुक्र, भौम, शनि, सूर्य, भौम से २।६।११।१२ स्थानों में सूर्य, चन्द्र, शनि, बुध से २।४।५।३ स्थानों में चन्द्र, गुरु, शुक्र, भौम, गुरु से ६।५।७।१२ स्थानों में शनि, भौम, चन्द्र, सूर्य, शुक्र से २।६।१२।४ स्थानों में भौम, बुध, सूर्य, शनि और शनि, और शनि से ३।११।६।७ स्थानों में शुक्र, चन्द्र, गुरु, भौम पाचक बोधक, कारक और वेधक होते हैं।।१६-१९।। पाचकाद्यास्तुत्वारः सूर्यादिभ्यः क्रमादिह । पीडर्क्षेवाप्यपीडर्क्षे केन्द्रे लग्नं विना तथा ।।२०।। सूर्यादि ग्रहों की शत्रुराशि, अपीडर्क्षे (मित्रराशि) में लग्न को छोड़कर केन्द्र में गये हुये सभी पाचक आदि ग्रह बली होते हैं।।२०।। षट्सप्तधर्मकर्मायमृतिष्वेव गताः क्रमात् । पाचकाद्याश्चतुर्थे च बलवंत समीरिताः ।।२१।। तथा लग्न से ६।७।९।१०।११।८।४ इन स्थानों में गये हुये सूर्यादि पाचक आदि क्रम से बली होते हैं।।२१।। कारको मंदफलदो वेधको विघ्नकृत्स्मृतः । बोधकः शीघ्रफलदः पाचको विफलप्रदः ।।२२।। कारक ग्रह न्यून फल वेधकं अपने भाव के फल की हानि करने वाला, बोधक ग्रह अपने भाव के फल को शीघ्र देने वाला तथा पाचक ग्रह अपने भाव संबंधित फल को विफल करने वाला होता है।।२२।।
अथ सप्तमोऽध्यायः । . ६७३ तदंशकालस्यांते वाप्यादावंत्यांशकेऽपि च । धृत्यांशकेऽपि फलदाः पाचकाद्याः क्रमादिह ।।२३।। ये पाचक बोधक कारक और वेधक ग्रह अन्तिम नवमांश में वा प्रथम तथा अन्तिम नवांश में भी फल देते हैं।।२३।। सूर्यादि ग्रहाणां गोचरे फलकालः। आदौ फलप्रदौ भौमरवी मध्ये सितार्यकौ । सर्वदाज्ञः शशी मंदस्त्ववसाने फलप्रदौ ।।२४।। भौम और सूर्य राशि के आदि में, शुक्र और गुरु राशि के मध्य में बुध सर्वदा और चंद्र शनि राशि के अन्त में फल देनेवाला होता है।।२४।। इति पाराशर होरायामुत्तरार्धे लोकयात्राध्याये प्रकीर्णकाध्यायः षष्ठः।।६।। अथ सप्तमोऽध्यायः भावफलानामवधिः। धनहानिभयानां च व्याधीनां दिवसास्तथा । शुभाशुभानि कर्माणि यात्रादि विजयादि च ।।१।। धन की प्राप्ति और हानि, शत्रु भय और रोग की प्राप्ति का दिन, और शुभ अशुभ कर्म जय पराजय और उत्कर्ष इनका निर्णय।।१।। मासचर्या विधानेन ब्रूयादन्येन चैतरान् । लग्णारिमृतिरिःफेषु कर्मणां च पतींस्तथा ।।२।। मासचर्या के अनुसार करना चाहिये, इससे भिन्न कार्यों को दिन और वर्ष चर्या के अनुसार करना चाहिये। इसमें भी १।६।८।१२ भावों के स्वामी और बिन्दु के स्वामियों का विचार करना चाहिये।।२।। करणेशान्समालोच्य कथयेन्सुनिपुंगव । रंसेषवोमुनिः खाष्टो रविभूपा दिशस्तथा ।।३।। सूर्य का ५६ दिन चन्द्र का ७ दिन, भौम का ८० दिन, बुध का १२ दिन, गुरु का १६ दिन शुक्र का १० दिन।।३।। द्विशतं च क्रमात्सूर्याद्दिवासान्नाष्टमे स्थिताः । द्वितीयेऽर्धं त्वंतरे च त्रैराशिकवशेन तु ।।४।।
६७४ . वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । और शनि का २०० दिन अष्टम भाव में फल देने का समय है। दूसरे भाव में उक्त दिन संख्या का आधा और २।८ भावो को छोड़कर अन्य भावों में अनुपात द्वारा दिन संख्या ले आकर अवधि कहना चाहिये।।४।। इति पाराशरहोरायामुत्तरार्धेलोकयात्रायाम्भावफलविवेकः सप्तमोऽध्यायः। अथाष्टमोऽध्यायः। अथयोगानां भङ्गयोगः। तेषां भंगमथो वक्ष्ये यथाह कमलासनः । गर्गाय भगवान्सोपि ममाहाहं तव द्विज ।।१।। हे मैत्रेय! पहले ब्रह्माजी ने जो योग भंग योग को गर्ग से कहा था और गर्ग ने मुझसे कहा था उसे मैं तुमसे कहता हूँ।।१।। तथा च रिःफषष्ठाष्टस्थानानां करणाधिपाः । तत्तद्भावस्य भंगस्य कर्त्तारः सति संभवे ।।२।। यदि लग्न से १२।६।८ भावों में बिन्दु देने वाले ग्रह बैठे हों या उन भावों के स्वामी के साथ बैठे हों तो भावों का भंग होता है।।२।। तत्तद्भावोऽष्टवर्गोत्थ संख्या तद्वर्गेणाहता । रविभक्ता ततः शिष्टा राशिर्मेषादिकाभवेत् ।।३।। जिस भाव का विचार करना हो उस भाव के करणांक (बिन्दु संख्या) संख्या से उस भाव के वर्गेणा से गुणकर १२ का भाग देने से शेष मेषादि से राशि होती है।।३।। षष्ठाष्टारिःफे राशिश्श्चेदंग एव प्रकीर्त्तितः । फलं च मुनि संवृद्धं रविभक्तं तथा भवेत् ।।४।। यदि यह राशि ६।८।१२ भाव में हो तो भाव का भंग होता है। यहाँ १२ से भाग देने से जो लब्धांक हो उसे ७ से गुणकर उसमें १८ से भाग देने से दोष राशि होती है यदि यह राशि ६।८।१२ भाव में हो तो योग का भंग होता है।।४।। शिष्टमेवं यदि तदा शत्रुर्भं वाथ भंगदम् । तद्भावानिष्टफलकं तच्छत्रुफलसंगुणम् ।।५।। पूर्वोक्त प्रकार से आई हुई राशि यदि लग्नेश की शत्रुराशि हो वा लग्न से भंग . . युक्त हो तो उस भाव का अनिष्टफल होता है।।५।।
अथाष्टमोऽध्यायः । ६७५ सप्ताप्तं शिष्टमेवात्र पापरस्मिगुणं ततः । अर्कशिष्टं यदि भवेत्षष्ठरिःफाष्टमेऽषि वा ॥६॥ जो शेष है वह जिस भाव का भंग करता है उस भाव के कष्टफल से उसे गुणकर ७ से योग देना जो शेष रहे उसे शत्रु की राशि से गुण देना उसमें १२ से भाग देने से शेष राशि ६।८।१२ में हो तो उस भाव का भंग कहना ॥६॥ शत्रुर्भ वापिभंगक्षं हानिस्तस्य प्रकीर्त्तिताः । यथोत्तरमितीवाप्तं क्षयवृद्धिस्ततो भवेत् ॥७॥ इस प्रकार से जो भंग आता है उसके १।२।३ के क्रम से क्षय और वृद्धि जानना चाहिये ॥७॥ पुनः प्रकारांतरेण। षष्ठ्यंशे च कलांशे च त्वप्रकाशग्रहोदये । राहुकालसमायोगेतद्भावफलभंगदः ॥८॥ जिस भाव के भंग का विचार करना हो उस भाव के षष्ठ्यंश वा कलांश (षोडशांश) में अप्रकाश में से किसी एक का उदय हो तो भाव का भंगकारक योग होता है॥८॥ अनिष्टाख्यं च रश्मिं च तद्भावफलसंगुणम् । द्वादशाप्तावशेषं च पूर्ववत्फलमीरितम् ॥९॥ अथवा भाव के अरिष्टरश्मि को उस भाव के इष्टवलांक से गुणाकर के उसमें १२ का भाग देने से शेष राशि से पूर्ववत् भाव के भंग योग का विचार करना ॥९॥ यद्यत्फलं प्रोक्तमथोत्तरत्र तत्सर्वमन्यत्र योजनीयम् । भंगं च भंगं च मुनिश्च गर्गः प्रोवाचयद्वन्मुनिपुंगवाहम् ॥१०॥ मैंने जो भावभंग का विचार कहा है सो उत्तरोत्तर जहाँ जहाँ उसका उपयोग हो वहाँ वहाँ देखना, जो भंग गर्ग मुनि ने कहा है उन्हीं भंगों का लक्षण मैंने कहा है॥१०॥ षष्ठ्यंशे च कलांशे च त्रिष्वेकोऽपि यदा न चेत् । अधिमित्रं च मित्रं च भंगभंगः प्रकीर्त्तितः ॥११॥ यदि अभीष्टभाव के षष्ठ्यंश वा षोडशांश में शत्रुराशि में अप्रकाश ग्रहों का उदय, राहु समायोग इसमें से कोई भी एक न हो और अधिमित्र वा मित्र हो तो पूर्वोक्त भंग का परिहार हो जाता है॥११॥ इति पाराशरहोरायामुत्तरार्धे लोकयात्रायां प्रकीर्णकाध्यायः अष्टमः।
६७६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ नवमोऽध्यायः । अथ भावानां संज्ञा। आत्मा शरीरं होरा च कल्पं लग्नं च मूर्तयः । स्वं कुटुम्बं च दुश्चिक्यं विक्रमं सहजं सह ॥१॥ लग्न के आत्मा, शरीर, होरा, कल्प, लग्न, मूर्ति नाम हैं। दूसरे भाव के स्वं और कुटुम्ब ये दो नाम हैं। तीसरे भाव का दुश्चिक्य, विक्रम, सहज, सह ये नाम हैं॥१॥ पातालं हिवुकं वेश्म मित्रवंधूदकं सुखम् । त्रिकोणं प्रतिभाबुद्धिमातृविद्यासुतास्ततः ॥२॥ चतुर्थभाव के पाताल, हिवुक, वेश्म, मित्र, वंधु, उदक, सुख नाम हैं, पंचम भाव के त्रिकोण, प्रतिभा, बुद्धि, मातृ; विद्या, सुत नाम हैं।।२।। व्याधिक्षतारिभंगाश्च क्रोधो लोभोऽथ मत्सर । कामो विवाहो यात्रा स्त्री रतिद्यूतं मदोऽज्ञता ॥३॥ छठे भाव के व्याधि, क्षत्र, अरि, भंग, क्रोध, लोभ, मत्सर नाम हैं। सप्तम भाव के काम, विवाह, स्त्री, रति, द्यूत, मद, अज्ञता नाम हैं।।३।। पराभवो मृतिर्वधो रंध्रायुर्निधनं च्युतिः । शुभं धर्मस्ततो भाग्यं त्रिकोणं च गुरुर्विभुः ॥४॥ अष्टम भाव के पराभव, मृति, वंध, रंध्र, आयु, निधन, च्युति नाम हैं। नवमभाव के शुभ, धर्म, भाग्य, त्रिकोण, गुरु, विभु नाम हैं।।४।। व्यापारस्पदमैषूरणमानाज्ञा कर्मखम् । भावाय लाभाप तपो रिःफं हानिव्ययःस्मृतः ॥५॥ दशमभाव के व्यापार, आस्पद मेषूरण, मान, आज्ञा, कर्म, रव, नाम हैं। एकादश भाव के आय, लाभ, अप, तप नाम हैं। व्ययभाव के रिःफ, हानि और व्यय नाम है।।५।। यात्रायां दशमेनैव निवृत्तिं सप्तमेन तु । वृद्धिश्चतुर्थलग्नेन त्रितयं संप्रकीर्तितम् ॥६॥ दशम भाव से यात्रा का विचार करना चाहिये और सातवें भाव से यात्रा में, निवृत्ति का विचार करना चाहिये। चतुर्थ से वृद्धि का विचार, इन तीनों को मिलाकर कुल ७० विषय हुये।।६।।
: अथ नवमोऽध्यायः । ६७७ स्वोच्चमित्र स्ववर्गस्था एवमर्थाश्च सप्ततिः । नीचारिवर्गाश्चान्यत्पुष्टंचापुष्टमेव च ॥७॥ यदि ग्रह मित्र, उच्च स्वक्षेत्र या षड्वर्ग में हों तो पूर्वोक्त सभी फल उत्तम होते हैं और यदि शत्रु, नीच शत्रुवर्गादि में हो तो अशुभ फल दायक होता है॥७॥ अथ ग्रहात् भाव विचारः। रविः शरीरे होरायां स्वे च भ्रातरि वेश्मनि । सुते व्याधौ क्षते शत्रौ मृतौ तपसि कर्मणि ॥८॥ सूर्य शरीर, लग्न, दूसरे भाव में तीसरे भाव में, चौथे घर में, पुत्र भाव में रोग विचार में, क्षत विचार में, मृत्यु और नवम के विचार में, कर्म के विचार में, दशम॥८॥ आये व्यये फलं दद्यात् शीतगुविक्रमे सुखे । कुटुम्बे भ्रातरिक्रोधे प्रतिभायां शुभे मृतौ ॥९॥ भाग्ये त्रिकोणे व्यापारे लाभे रिःफे फलप्रदः । आय और व्यय के विचार में फल देता है। चन्द्रमा प्रताप, कुटुम्ब, पोस्यवर्ग, भाई, क्रोध, बुद्धि, विशेषकर्म भाग्य, पंचम नवम भाव विचार और क्रयविक्रयादि और लाभ व्यय के विचार में फल देता है॥९॥ कुजः शरीरे होरायां कल्पविक्रमवंधुषु । सहजे च सहे शत्रौ क्रोधे लोभे च रंध्रके ॥१०॥ क्रियायायतौ हानौ जये भंगे फलप्रदः ॥११॥ मङ्गल से होरा कल्पशास्त्र, प्रताप, भाई, सहज, शत्रु, लोभ अष्टमभाव, कर्म, प्रभाव, हानि, उत्कर्ष और पतन का विचार करे॥१०-११॥ बुधो मनसि विद्यायां बुद्धौ हिंबुक वेश्मनि । लोभे शिल्पे च गानादिप्रिये स्वेलाभरिःफयोः ॥१२॥ बुध मानसिक विचार में विद्या, चतुर्थभाव, लोभ, शिल्प, गान-विद्या ग्यारहवे और बारहवें भाव के विचार में फल देता हैं॥१२॥ गुरुकर्मे च तपसि त्रित्रिकोणे त्रिकोणके । आज्ञायां च सुते हानौ कारागृहनिवेशने ॥१३॥ गुरु धर्म, तप नवम पंचम, आज्ञा, पुत्र, हानि, कारागार प्रवेश॥१३॥
६७८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अभिशापे तथा व्याधौ स्वैकल्पे मूर्त्तिवेश्मसु । विद्याबुद्धिसुखेभावे शांत्यादिषु फलप्रदः ॥१९४॥ अभिशाप, व्याधि, रचैकल्प, मूर्त्ति, गृह, विद्या, बुद्धि, सुख, चतुर्थ भाव और शांति में फल देता है॥१९४॥ कामान्यस्त्रीविवाहेषु गीतनृत्य प्रीयादिषु । सुखे वेश्मनि दुश्चिक्ये स्वे कुटुम्बेच वेश्मनि ॥१९५॥ शुक्र से अन्य स्त्री समागम, विवाह, नृत्यगाना, सुख, गृह तृतीयभाव, धन,. द्वितीय भाव, चतुर्थभाव॥१९५॥ आज्ञा क्रियातपो भाग्ये लाभायव्ययहानिषु । वदान्यत्वे दयायां च भार्गवः फलदः सदा ॥१९६॥ आज्ञा, तप, भाग्य लाभ और हानि का विचार करना चाहिये॥१९६॥ शनिर्भतौ ध्यये रिःफे दुश्चिक्येक्षत चेतसि । सहजे च सहे भावे बंधने फलदो भवेत् ॥१९७॥ शनि से मृत्यु, व्यय तीसरे भाव, क्षत, चित्त, सहज बंधु वंधन का विचार करना चाहिये॥१९७॥ कालहोरादृकाणेशाः क्षेत्रार्कनवभागपाः । सप्तांशत्रिंशदंशेशा होरेशश्चाष्टमो भवेत् ॥१९८॥ कालहोरेश, द्रेष्काणेश, गृहेश, द्वादशांशेश, नवांशेश, सप्तमांशेश त्रिंशांशेश और होरेश ये क्रम से यथोत्तर बली होते हैं॥१९८॥ क्रमादावृत्तितः प्रोक्ता बलिष्ठः पूर्वतो यथा । सूर्यादयो ग्रहा लग्नपतिश्चावृत्तितः क्रमात् ॥१९९॥ सूर्यादि सात ग्रह और आठवां लग्न इनमें जो वली हो वही प्रथम फल देने वाला होता है॥१९९॥ इति पाराशर होरायामुत्तरार्धे लोकयात्रायां नवमोऽध्यायः॥९॥ दशमोऽध्यायः । अथ आयुषः प्रकारांतराणि। वक्ष्येऽहं दायोत्थं नृणामायुः परं मुने । पैड्यो द्वादशधा प्रोक्तो ध्रुवरश्मि समुद्भवौ ॥१॥
दशमोऽध्यायः । ६७९ हे मैत्रेय! अब मैं हरण आदि से शुद्ध मनुष्यों के परम आयु को तुमसे कह हूँ। उसमें प्रथम पिंडायु है जो १२ प्रकार का है, ध्रुवायु (निसर्गायु) ४ प्रकार ।१।। अंशकाष्टकवर्गोत्थौ प्रत्येकं तु चतुर्विधम् । विषयोक्तो द्विधा प्रोक्तौ नक्षत्रांशकसंभवौ ॥२।। रश्मि से उत्पन्न आयु ४ प्रकार का, अंशोद्भव ४ प्रकार का, अष्टवर्गोद्भव कार का सब मिलकर १६ प्रकार, नक्षत्रोत्पन्न २ प्रकार और अंशोद्भव २ प्रकार कुल मिलाकर ३२ प्रकार के आयु के भेद होते हैं।।२।। अथ पिंडायुषः ध्रुवांकाः- द्वात्रिंशद्भेदभिन्नं स्यात्परमायुर्नृणामिह । अतिधृतिरर्कस्येन्दोस्तत्वानि पंचदश ।।३।। सूर्यादि ग्रह अपने परमोच्च में हों तो क्रम से सूर्य का १९, चन्द्रमा का २५, का १५, बुध का १२, गुरु का १५।।३।। द्वादशवुधस्य च गुरोस्तिथिः कवेर्मूच्छनानखाश्चार्किः । परमोच्चे च नीचेऽर्धं परेषुभावेषु वा तथा प्रोक्ताः ।।४।। शुक्र का २१ और शनि का २० पिंडायु का ध्रुवांक होता है और नीच में तो अपने २ ध्रुवांक का आधा ध्रुवांक होता है।।४।। अनुपातः कर्त्तव्यस्वंतरसंस्थेषु खेतेषु । खखभूमेः खयुग्मेंद्वो स्वांशाः पूर्ववत्कृतौ ।।५।। उक्त नीच के मध्य में ग्रहो हो तो अनुपात द्वारा फल की आना चाहिये। और ग्रहों की १०० या १२० वर्ष की परमायु होती है।।५।। नैसर्गिक रश्मिजायुषोः ध्रुवांकाः। कृतिरेको यमौ रत्नमष्टादश नखाः क्रमात् । सैकंतानमिनादीनशं दाये नैसर्गिके स्मृतम् ।।६।। सूर्यादि अपने उच्च में हों तो सूर्य का २०, चन्द्र का १, भौम का २, का ९, गुरु का १८, शुक्र का २० और शनि का ५० ध्रुवांक नैसर्गिक में है।।६।। षोडशविंशतिरेको नवाष्टनव पंचविंशतिः । षड्विंशतिस्तथोच्चे नीचेचार्द्धं रश्मौचत्विमेऽथवा ।।७।। उसी प्रकार से सूर्यादि उच्च में हो तो सूर्य का १६, चंद्र का २०, भौम
का १, बुध का ९, गुरु का ८, शुक्र का ९ और शनि का २५ या २६ रश्म्यायु में ध्रुवांक होता है। शेष क्रिया पूर्ववत् समझना ।।७।। अथध्रुवांकेभ्यो आयुसाधनप्रकारः- कलीकृतं ग्रहं व्योमखब्धिनेत्रावशेषितम् । शतद्वयेनाभिभजेद्वदमासादयः क्रमात् ।।८।। जिस ग्रह की आयु लाना हो उसके राश्यादि की कला बनाकर उसमें २४०० से भाग देकर शेष जो बचे उसमें २०० से भाग देने से वर्ष मासादि क्रम से आयु होती है।।८।। उदाहरण- सूर्य राश्यादि ३।१८।२६।३४ की कला ६५०६।३४ इसमें २४०० से भाग देने से शेष १७०६।३४ बचा इसमें २०० का भाग देने से लब्ध ८ और १०६।३४ इसमें ध्रुवांक १९ से गुणाकर २०० से भाग देने से लब्ध १० वर्ष शेष १४।४५ इसे १२ से गुणाकर २०० से भाग देने से लब्ध मास ० शेष १७७।१२ को ३० से गुणाकर २०० से भाग देने से २६ दिन शेष १९६।० को ६० से गुणाकर २०० से भाग देने से लब्ध २४ घटी शेष १६० को ६० से गुणाकर २०० का भाग देने से लब्ध ४८ पल प्राप्त हुआ। इस प्रकार लब्ध वर्षादि १०।०।२६।३४।४८ पूर्व लब्ध वर्ष १० में जोड़ देने से सूर्य की वर्षादि १८।०।२६।३४।४८ पिंडायु हुई। इसी प्रकार अन्य ग्रहों का भी पिंडायु साधन करना। नवांशायुर्दायसाधनम्। सूर्यादिगुणिताच्छेषाद्वृद्धिं कुर्याद्यथोत्तरम् । स्वोच्चहीनं ग्रहं कृत्वा कर्कादिच मृगादि च ।।९।। गृहीत्वातु भुजं कोटिं कृत्वा लिप्तीकृतं तुतम् । हत्वा नवांशदायेन भजेद्भत्रयलिप्तिभिः ।।१०।। सूर्यादि ग्रहों के उच्च राश्यादि को उनमें घटाने से केन्द्र होता है। उसका भुज और कोटि करके, कोटि की कला बनाकर ध्रुवांक से गुणाकर उसमें तीन राशि की कला ५४०० से भाग देने से।।१०।। वत्सराद्या भवंत्येते वर्जयेन्मकरादिके । केन्द्रे नवांशदाये स्वे त्रिघ्ने कर्कटकादिके ।।११।। लब्ध वर्ष होता है शेष को पुनः १२ आदि से गुणाकर ५४०० से भाग देने से लब्ध मासादिक होता है। यदि मकरादि केन्द्र हो तो तीन से गुणे हुये ध्रुवांक में घटाने से और कर्कादि केन्द्र हो तो ध्रुवांक का आधा जोड़ देने से मध्यम नवांशा युदयि होता है।।११।।
दशमोऽध्यायः । ६८१ नवांशायुर्दाये विशेषः। युंज्यादर्धीकृते तस्मिन् प्रक्रमानुगतो मतः । द्विघ्ने त्वपनयेत्तस्मिन्युज्यादेव दलीकृते ।।१२।। पूर्व साधित नवांशायुर्दाय में यदि केन्द्र मकरादि ६ राशि में हो तो मूल ध्रुवांक को दूना करके उसमें घटा देना और कर्कादि ६ राशि में हो तो मूल ध्रुवांक का आधा कर उसमें जोड़ देने से आयुर्दाय होता है।।१२।। अष्टकवर्गायु साधनम्। निक्षिप्याष्टकवर्गं तु राशिचक्रे तु पूर्ववत् । त्रिकोणैकपशुद्धिं च कृत्वा तु गुणयेद्गुणैः ।।१३।। पहले अष्टक वर्ग बनाकर त्रिकोण शोधन और एकाधिपत्यशोधन करके संख्या को राशि गुणाकर पिंड बनाकर।।१३।। खवन्हि भक्तभब्दाद्याः क्रमाद्भिन्नाष्टवर्गजाः । एवं कृत्वा तु संयोज्य भाप्तसमद्वादयः स्मृताः ।।१४।। उसे (पिंडको) ३० से भाग देने से भिन्नाष्टक वर्गायु होता है। पूर्वोक्त प्रकार से लाये हुये पिंड में २७ का भाग देने से वर्षादि समुदायाष्टक वर्गायु होता है।।१४।। कृत्वा करणदैरेवं स्वोत्पन्नौ दायसंज्ञितौ । प्रत्येकं भिन्नदायोत्थास्त्वैवं त्रिंशद्विदामताः ।।१५।। और इसी प्रकार से करणायु भी लाना चाहिये। पिंडायुर्दाय सप्तग्रहों के ७ प्रकार की, ध्रुवायुर्दाय सप्तग्रहों के ७ प्रकार की, रश्म्यायुर्दाय सप्तग्रहों की ७ प्रकार की, अंशायुर्दाय सप्त ग्रहों के ७ प्रकार की, रेखाष्टक वर्गोत्थ आयु १ प्रकार और करणाष्टकवर्गोत्थ आयु के ३० भेद हुये।।१५।। नवांशायुर्दाये ध्रुवाङ्काः। पंचमूर्छा सप्त रत्नं दश षोडश वारिधिः । नवांशविधितः प्रोक्ता अंत्यात्रोक्तास्तुभादितः ।।१६।। सूर्य का ५, चन्द्र का २१, भौम का ७, बुध का ९, गुरु का १०, शुक्र का १६ और शनि का ४ अंशायु साधन के ध्रुवांक हैं। प्राप्तनवांश से आरम्भ कर अनुलोम विधि से आरम्भ कर अनुलोम विधि से अंतिम नवांश पर्यन्त गणना करना चाहिये।।१६।।
, it is printed: द्वात्रिंशद्भेद्भिन्नोऽयमायुषो निर्णयः कृतः ।
L23: लोकयात्रा परिज्ञानहेतवे दायनिर्णयः ।।२००।।
L24: हे मैत्रेय! मैंने लोक के सुख दुख को जानने के लिये ३२ भेद से युक्त आयु
L25: का निर्णय कहा।।२००।।
L26: भावानां संप्रवक्ष्यामि शृणुष्वः मुनिपुंगवः । Wait, look at "शृणुष्वः": शृ - णु - ष्व - ः Yes, there is a visarga! Then: मुनिपुंगवः ।
L27: आयुञ्च परमं हत्वा स्वेन स्वेन बलेन च ।।२०१।। Wait, "आयुञ्च": आ - यु - ञ्च Yes, ञ्च (nya + ca). "हत्वा": ह - त्वा (not हृत्वा, standard हत्वा). "स्वेन स्वेन बलेन च ।।२०१।।"
L28: इन ३२ प्रकारों के बाद आठवां भावों का आयुर्दाय कहता हूँ। पूर्वोक्त सात
L29: प्रकार के आयुर्दाय में से किसी एक को लेकर उसे अपने-अपने भावबल से
L30: गुणाकर।।२०१।।
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एकादशोऽध्यायः। ६८३ विभजेद्बलयोगेन भावानां दाय एव सः । अथवांशर्कदायेन वर्गेशानां बलेन तु ॥२२॥ भावबल समूह से भाग देने से जो लब्धि हो वही आयुर्दाय होती है। पुनः प्रकारांतर से नवमांशायुर्दाय से परमायुष्य को गुणन कर षड्वर्ग पतियों के बल से भाग देने से वर्षादि भावायुर्दाय होता है।।२२।। स्थानाद्यैश्च समुद्भूतः षड्विधो दायउच्यते ।।२३।। इस प्रकार से भाव, नक्षत्र, नवांश, अष्टकवर्ग, अंश और पैंड्य ये ६ प्रकार के आयुर्दाय भेद कहे।।२३।। इति पाराशर होरायामुत्तरराधे आयुर्दायकथने दशमाध्यायः।।१०।। एकादशोऽध्यायः। आयुषःह्रासवृद्धेःयोगः। आरार्कौ वक्रिणौमृत्युश्चान्योन्यभवनस्थितौ । वेश्मषण्मृत्युत्रिःफस्था णीनेन्दूत्यत्तिपाष्टपाः ।।१।। भौम शनि वक्री होकर परस्पत् एक दूसरे के गृह में हों तो मृत्युकारक होते हैं। यदि क्षीणचंद्र लग्नेश और अठमेश ६।८।१२ स्थान में हों तो मृत्युकारक होते हैं।।१।। अष्टमस्था ग्रहाः सर्वे पापदृष्टियुतास्तु वा । भौममंदर्क्षगाश्चेतु शुभदृष्टिविवर्जिताः ।।२।। अष्टम स्थान में पापग्रह से दृष्टयुत सभी ग्रह मृत्युकारक होते हैं, यदि अष्टमस्थ ग्रह भौम शनि की राशि में हों और शुभग्रह की दृष्टि से हीन हों तो मृत्युकारक होते हैं।।२।। आयुष्ययोगाः। केन्द्रत्रिकोणे च शुभाश्चपापाः षष्ठेत्तीयेच मृत्युसंस्थाः । अष्टोत्तरं जीवति वर्षमायुर्नरो गुणाढ्यो नवतिः सुशीलः ।।३।। शुभग्रह केन्द्र त्रिकोण में हों तो १०८ वर्ष की आयुष्य होती है, पापग्रह ६।३ भाव में हों और आठवें भाव में कोई ग्रह न हो तो ९० वर्ष की आयु होती है।।३।। लग्ने गुरौ दैत्यगुरौ चतुर्थे बुधे सुते षष्ठगते च सूर्ये । स्थानंच शात्रोश्च मृतिं च हित्वा त्वन्ये स्थिताश्चेन्नवतिश्चषट्कः ।
· ६८४ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । लग्न में गुरु, चौथे भाव में शुक्र, बुध पांचवें भाव में और छठें भाव में सूर्य हो तो ९० वर्ष की आयु, यदि चंद्र, भौम, शनि ये तीनों ग्रह अपने शत्रुराशि और अष्टमभाव को छोड़कर अन्यस्थान में बैठे हों तो ९६ वर्ष की आयु होती है।।४।। सुखादिकेन्द्रेषु गुरुः स्थितश्चेत्तत्पंचमेज्ञे तु भृगौतुषष्ठे । षडुत्तरा सप्ततिरष्टयुक्ता त्वंशीतिरेकोत्तरतः प्रदिष्टा ।।५।। चतुर्थ आदि केन्द्र में गुरु हों और गुरु से पाचवें भाव में बुध हों तथा छठें भाव में शुक्र हो तो ७६ वर्ष की आयु होती है। सातवें भाव में गुरु हो और उससे चौथे भाव में बुध शुक्र हों तो ८८ वर्ष की आयु होती है। तथा दशम भाव में गुरु हों और उससे ५।६ भाव में क्रम से बुध शुक्र हों तो ८१ वर्ष की आयु होती है।।५।। केन्द्रादि आयुष्य- केन्द्रादिस्थाः शतं दद्युर्नवाष्टादींश्च दिग्गुणान् । मिश्रं संयुज्य दलिता अनुपातेन वत्सराः ।।६।। सभी ग्रह केन्द्र में हों तो १०० वर्ष की आयु, पणकर में हों तो ९० वर्ष की आयु और सभी अपोक्लिम में हों तो ८० वर्ष की आयु होती है। यदि दो स्थान में ग्रह हों तो दोनों स्थान की आयु के योग की आधी आयु होती है।।६।। शत्रुनीच समाशेषु दिग्विधेषु न चेत्स्थिताः । शतायुर्योग हीनास्तु सर्वे प्रोक्ता कलौ युगे ।।७।। यदि तीनों स्थानों में ग्रह हों तो तीनों के योग का तृतीयांश आयु वर्ष होता है। यदि उक्त दशविध (३२ श्लो., ४ श्लो., ५ श्लो, ६ श्लो. में कहे हुये) आयुष्य में कोई न हो तो गणितागतायु लेना। कलियुग में सभी मनुष्य १०० वर्ष से अल्प आयुवाले होते हैं।।७।। पूर्वोक्तायुषे हानिः- दायानां हरणं वक्ष्ये शृणुष्व मुनिपुंगव । आयुर्दाये तु हरणं षड्विधं संप्रकीर्त्यते ।।८।। हे मैत्रेय! आयु का हरण कहता हूँ उसे सुनो। वह हरण ६ प्रकार का होता है।।८।। व्ययादिहरणं पूर्वमस्तारिहरणं तथा । क्रूरोदयस्थ हरणं चन्द्रयुक्ततमस्तथा ।।९।।
एकादशोऽध्यायः । ६८५ १-१२ वें भाव से सातवें भाव तक वाम, २- अस्तगत और ३- शत्रु राशिगत का हरण, ४- लग्न में क्रूरग्रह का हरण, ५- चन्द्र सहित राहु का हरण और ६- व्ययस्थ पापग्रह ये ६ प्रकार के आयु के हरण होते हैं॥८९॥ पापो व्ययस्थो हरति सर्वदायं द्विजोत्तम । अथ द्वित्रिचतुः पंचषडंशोनं क्रमादमी ॥९०॥ बारहवें भाव में पापग्रह हो तो सम्पूर्ण आयु की हानि, ग्यारहें भाव में हों तो आयुष्य का आधा, दशम भाव में हो तो आयुष्य का तृतीयांश नवम भाव में हो तो आयुष्य का चतुर्थांश, अष्टमभाव में हो तो आयुष्य का पांचवा भाग और सातवें भाव में हो तो आयु का छठां भाग कम हो जाता है॥९०॥ लाभादिसंस्थिताः खेटा वाभतः प्रक्रियांशृणु। हरंति सौम्याः प्रोक्तार्धं लग्नद्वादश संधिषु ॥९१॥ संधिगत पापग्रह हो तो ज्यो का त्यों हरण होता है यदि शुभग्रह हो तो आधा हरण होता है॥९१॥ पापश्चेत्सकलं हंति शुभो दलमथोत्तरम् । लग्नाद्द्वादशसंधौ च ग्रहान्यायान्निवर्जयेत् ॥९२॥ लग्न से आरंभ कर द्वादश संधियो में पापग्रह हो तो संपूर्ण आयु और शुभग्रह हो तो आयु का आधा क्षय होता है। लग्न से द्वादशभाव की संधियों में पापग्रहों को घटा देवे॥९२॥ राश्यभावे तु भागादीन् दायघ्नान्षष्ठिभाजितात् । दाये द्विघ्ने तु सौम्यस्य राशिरेको दलं यदि ॥९३॥ यदि राशि न हो तो अंशादि को उनके आयु से गुणाकर ६० से भाग देवे जो लब्ध अंशादि हो उरो संधि में घटाने से शेष आयुष्य का हरण फल होता है। यदि शुभग्रह की राशि का अभाव हो तो दाय को दूना कर उससे दाय को गुणाकर ६० का भाग देकर लब्धि को संधि में घटाने से शेष आयुहरण फल होता है॥९३॥ अधिकेनापहत्तंतु क्रमाद्राशिं विना कृतम् । दायद्विगुणया सौम्यो लब्ध्वा वाऽपचयेसमाः ॥९४॥ इस प्रकार से लाया हुआ फल एक राशि का दूसरा दल का इनमें जो अधिक हो उसमें न्यून को घटाना चाहिये। यह आयु के हरण में वर्ष होता है॥९४॥
६८६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । वहवश्चेद्दली हंति समाश्चेत्प्रथमॊ मतः । अंशक ग्रहयोगे च द्वयोः पापे हरत्युत ।।१५।। उक्त प्रकार एक ग्रहयोग में कहा है यदि बहुत से ग्रह भावसंधि में हों तो जो सबमें बली हो वही आयु का हारक होता है। यदि दो ग्रह पापग्रह और शुभग्रह हों तो उसमें पापग्रह ही आयु का हरण करता है।।१५।। सौम्योऽपि पापवर्गे च स्थितो रिः फादिषट्सुचेत् । त्रिषु भावगतानां च पापानां करणं स्मृतम् ।।१६।। यदि दोनों शुभग्रह ही होवें तो यदि वे पापवर्ग में होकर १२ भाव से आरम्भ कर ६ठे भाव के अन्दर हों तो आयुहारक होते हैं। इसी प्रकार भावगत बारहवें से ६ठे भाव के अन्दर पापग्रह हों तो उनमें केवल सूर्य भौम शनि ही हरण कारक होते हैं। उक्त भाव गत पापग्रहों के फल का भी उत्पादन होता है।।१६।। पूर्वोक्त फलस्य पुष्टिः- कुटुम्बभरणं चापि दुश्चित्तं लाभमेव च । मेधां च प्रतिभां शान्तिं मंदक्रोधं करिष्यति ।।१७।। यदि पापग्रह १२ वें भाव में हो तो कुटुम्ब का पोषक होता है, ११ वें भाव में हो तो दुश्चित्त होता है। १० वें भाव में हो तो लाभ होता है। ९ वें भाव में हो तो धारणात्मिका बुद्धि होती है। ८ वें भाव में हो तो शान्ति का लाभ और ७ वें भाव में हो तो थोड़ा क्रोध होता है।।१७।। अस्तंगतग्रहस्य तथा लग्नस्य आयुः- अस्तंगतानां सर्वेषां दलं दायः स्मृतस्तदा । राशिसंख्यासमाश्चाब्दा लग्नेऽब्जेबलवत्तरम् ।।१८।। अस्तंगत सभी ग्रहों की आयु का आधा ही आयु शेष रहता है। यदि लग्न में चन्द्रमा हों और बलवान् हो तो लग्न की राशि के समान वर्ष लग्न की आयु होती है।।१८।। अंशान् लिप्ताहतान् कृत्वा खखाक्षिभ्यां समाहृताः । शेषा मासादयः प्रोक्ता वर्तमानाब्दयोजने ।।१९।। यदि लग्न में चन्द्रमा न हो अथवा निर्बल हो तो लग्न की राशि को छोड़कर अंश को ६० से गुणाकर उसमें कला को जोड़कर २०० से भाग देने से लब्धि
एकादशोऽध्यायः। ६८७ वर्ष और शेष को १२ आदि से गुणाकर भाजक से भाग देने से मास आदि होते हैं। इस प्रकार आये हुये मासादि आयु में पूर्वोक्त वर्ष जोड़ देने से लग्न की वर्षादि आयु होती है।।१९।। लग्ने क्रूरग्रहे सति- क्रूरे क्रूरोदयघ्नं तमष्टोत्तरशतैर्हृतम् । लब्धं चापनयेद्वाये स्वेतथा परमायुषि ।।२०।। लग्न में क्रूरग्रह हो तो लग्न के अंशादि को क्रूरग्रह के वर्तमान नवांश राशितुल्य अंक से गुणाकर १०८ का भाग देने से लब्ध वर्षादि को लग्न की आयु में घटाने से शेष लग्न की स्पष्ट आयु होती है।।२०।। स्वोच्चे मूलत्रिकोणे च लब्धस्यार्धविवर्जयेत् । मित्रेऽधिसुहृदि प्रोक्तं पादोनेनापनायनम् ।।२१।। लग्न में पापग्रह अपने उच्च वा मूल त्रिकोण राशि का हो तो पूर्वोक्त विधि से प्राप्त वर्षादि का आधा ही परमायु में घटाना चाहिये। यदि पापग्रह अपने मित्र या अधिमित्र के गृह में हो तो लब्ध का चतुर्थांश घराना चाहिये।।२१।। भावेष्वेवं विधिः प्रोक्तो वर्गाणामधिपेषु च । तिष्ठन्तौ शुभपापौ चेत्यापोदयविधिः स्मृतः ।।२२।। यह हरण प्रकार लग्न में क्रूरग्रह के रहने से ६ वर्गों के अधिपति क्रूरग्रह हों और लग्न में क्रूरग्रह न हो तब के लिये कहा है। यदि लग्न में शुभ पाप दोनों हों तब भी पापग्रह का ही हरण करना। और लग्न में पापग्रह अधिक हों तो जो उसमें अधिक बली हो उसी का हरण करना चाहिये।।२२।। अष्टमभावे केन्द्रे च शुभपाप योगे- क्रूरेष्टमेष्टमांशेन भावस्याप्यनुपाततः । लग्नाधिपेतराष्टांशं पापो हरति मृत्युगः ।।२३।। अष्टमभाव में पापग्रह हो तो भाव की आयु का अनुपात द्वारा अष्टमांश का हरण होता है। किन्तु लग्नेश की आयु को छोड़कर अन्य ग्रहो की आयु का अष्टमांश हरण होता है।।२३।। वहवश्चेदली सौम्यपापेष्वेवंविधिः स्मृतः । तयोर्दायांतरं दायः केन्द्रस्य च विधीयते ।।२४।।
६८८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । बहुत से पापग्रह हों तो जो सबमें बली हो उसी का हरण होता है। पापग्रह शुभग्रह दोनों हों तो दोनों के आयुष्य का अन्तर करके जो शेष रहे वही आयुष्य होती है। इसी प्रकार केन्द्रस्थ शुभ पाप के स्थिति के अनुसार समझना।।२४।। राहुयुक्त चन्द्रस्यायु विचारः- सेन्दौ राहौ दशाराहोरानीता मूलदायवत् । चन्द्रायुः पिंडतः शोध्या तद्राहुकरणं स्मृतम् ।।२५।। चन्द्र युक्त राहु हो तो पूर्वोक्तवत् दशा लाकर उसका पिंड बनाकर चन्द्रायु का पिंड बनाकर उसमें शोधन करने से शेष राहु का कारण होता है इसपर से पूर्वोक्तवत् अंशायु के अनुसार ही राहु का आयु वर्ष होता है।।१५।। अंशदायक्रमेणैव तमसोऽब्दाः समीरिताः । तस्मिन्सचन्द्रे तल्लग्नभावसाधनतस्ततः ।।२६।। लग्न में चन्द्रमा और राहु हों तो लग्न के ही समान आयु का साधन करना चाहिये।।२६।। तत्तद्दृष्टिहतं कृत्वा षष्ट्याप्तं धनशोधने । सोदये च सराहिंदावयं न्यायः समीरितः ।।२७।। किन्तु राहु चन्द्र दृष्टियों का परस्पर गुणाकर ६० का भाग देने से जो फल आवे उसे मकरादि में धन और कर्कादि में ऋण करने से स्पष्टायु होती है यदि लग्न में राहु के साथ चन्द्रमा हो तो यह विधि उचित है।।२७।। द्रेष्काणवशात् हानि वृद्धिः। स्थानवृद्धिः क्षयः कार्योद्रेष्काणर्क्षसराशिकम् । अस्तंगतानामर्धं स्याद्विना भृगुसुतं शनिम् ।।२८।। यदि लग्न की राशि और द्रेष्काण की राशि एक ही हो तो भाव स्थफल की वृद्धि होती है और दोनों की भिन्न राशि हो तो भावफल की हानि होती है। शुक्र और शनि को छोड़कर अन्य अस्तंगत ग्रहो की आयु के आधे का ह्रास होता है।।२८।। तयोर्वेदांशहीनं स्याल्पंशोनं शत्रुगस्य तु । अंगारकं वर्जयित्वा शत्रुक्षेत्रगतैग्रहैः ।।२९।। यदि शुक्र शनि अस्त हों तो इनकी आयु का चतुर्थांश हास होता है। भौम
एकादशोऽध्यायः । ६८९ को छोड़कर शेष शत्रुक्षेत्र ग्रहों की आयु का तृतीयांश हास होता है। यदि ग्रह मित्रवर्ग का हो तो तृतीयांश के आधे की ही हानि होती है।।२९।। सुहृद्वर्गगतानां तु तद्दलं हरति स्वकम् । एवं भावेषु सर्वेषु षड्विधं हरणंनहि ।।३०।। इस प्रकार सभी भावों के ६ प्रकार के हरण नहीं होते किन्तु ग्रहों के ही होते हैं।।३०।। अष्टवर्गोत्पन्न अंशायुर्बिहरणम् - हरणं नैव कर्त्तव्यंमदादायेऽष्टवर्गगे । स्वोच्चे च त्रिगुणं प्रोक्तं स्ववर्गे द्विगुणं तथा ।।३१।। अष्टवर्ग से उत्पन्न अंशायु में हरण नहीं करना किन्तु ग्रह उच्च में हो तो आयु को त्रिगुणित कर देना, अपनी राशि में हो तो दूना करना।।३१।। अधिमित्रगृहे सार्धं त्र्यंशं मित्रगृहेयुतम् । अरावप्यरिभावे च त्र्यंशखंडविवर्जितम् ।।३२।। अधिमित्र के गृह में हो तो आयु का आधा उसमें और जोड़ देना, मित्र के गृह में हो तो तृतीयांश जोड़ देना।।३२।। अष्टवर्गोत्थदायेषु प्रोक्तोऽयं विधिरंजसा । भावदायेषु सर्वेषु प्रोक्तोऽयं विधिरुत्तमः ।।३३।। यदि शत्रु के गृह में या अधिशत्रु के गृह में हो तो आयु का तृतीयांश घटा देना। यह विधि अष्टवर्गायु और सभी आयु के साधन में उत्तम है।।३३।। अंतर्दशाप्रकारः- दायगस्य तु सर्वस्य सहगस्य दलं भवेत् । सुतधर्मगयोस्त्र्यंशं पादं मृतिसुखस्थयोः ।।३४।। ग्रह के आयुष्य के तुल्य ही वर्षादि उसकी दशा होती है, उसमें ग्रह के साथ रहने वाले ग्रह का दशापति के आयु का आधा वर्षादि अंतर्दशा होता है। दशापति से ५।९ भाव में ग्रह की आयु के तृतीयांश के तुल्य और आठवें चौथे में स्थित ग्रह की आयु का चतुर्थांश अंतर्दशा होनी है।।३४।।
६९० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । सप्तांशं सप्तमस्थस्यप्रक्रियां प्रोच्यतेऽधुना । अंशान्यरस्परहताञ्छेदेनैव विभाजितम् ।।३५।। जो सातवें भाव में हो वह सप्तमांश हरण करता है।।३५।। तत्तद्दंशविभक्तं च स्वस्य स्वस्य समं भवेत् । नीचार्धपक्षे सर्वत्र विधिरेष विधीयते ।।३६।। परस्पर अंश और छेदों का समच्छेद करके आयु को गुणाकर छेद से भाग देने से क्रम से अंतर्दशा का वर्षादि आ जाता है।।३६।। समच्छेदाभावस्थानम् - नीचाभावेऽष्टवर्गोत्थं भावदायेंडशकक्रमे । नायं विधिसमृतस्तत्र बहवश्चेत्तु तेऽखिलम् ।।३७।। पूर्वोक्त हरण विधि नीच रहित, अष्टवर्गायु तथा अंशक क्रम में नहीं करना। यदि उक्त विषय में अनेक ग्रह हों तो वे सम्पूर्ण आयु को देते हैं।।३७।। केन्द्रादिगा ग्रहाः सर्वे ददत्येर्वापहत्य च । अर्धत्र्यंश च पादं च हरणाभाव सम्मतौ ।।३८।। सभी ग्रह केन्द्रादि स्थानों में अर्थात् केन्द्र, पणफर, आपोक्लिम में क्रम से आधा, तृतीयांश और चतुर्थांश तुल्य आयु का ह्रास करते हैं।।३८।। अंतर्दशा के नियम- सर्वाद्धित्रित्रिवेदाश्च त्रिषट्सप्ताष्टपाणयः । स्वक्षैहोरादृकाणेशास्त्रिंशाशेशाद्रि भागपाः ।।३९।। यदि अंतर्दशेश अपनी राशि में हो तो सम्पूर्ण आयु का भोग करता है। यदि वही होरेश हो तो आयुष्य का आधा, द्रेष्काणपति हो तो तृतीयांश त्रिंशांश पति हो तो तृतीयांश सप्तमांश पति हो तो।।३९।। चतुर्थांश, नवांशपति हो तो तृतीयांश, द्वादशांश का अधिपति हो तो षष्ठांश, कालहो रेश हो तो सप्तांश, षष्ठ्यंश का स्वामी हो तो अष्टमांश और षोडशांश का स्वामी हो तो द्वितीयांश भोग करता है। इस प्रकार से सभी अंतर्दशा के स्वामी भोग करते हैं।।४०।। ग्रहाभावात्ततस्तस्मात्स्थितानां द्वादशस्वपि । भावानां च क्रमात्प्रोक्ता भगांशाश्च स्वयंभुवा ।।४१।।
अथ द्वादशोऽध्यायः । ६९१. ग्रहों से भावों के बारहवें स्थानों के भागांश को ब्रह्माजी ने कहा है।।४१।। सर्वद्विवेदसप्ताष्टत्रिदल दिशाद्रयः । वेदांगा हारका एव ग्रहाणां समुदीरिताः ।।४२।। वह इस प्रकार है— तनु आदि भावों का क्रम से सम्पूर्ण, आधा, चतुर्थांश, सप्तांश, अष्टमांश, षष्ठांश, तृतीयांश, नवांश, दशांश, चतुर्थांश और बारहवें भाव का षष्ठांश यह ग्रहों के हारक भाग कहे गये हैं।।४२।। हत्वा दायं वलैः स्वैस्तु वलं योगेनभाजयेत् । आयव्यये तु भावानां ग्रहाणां वियदादिषु ।।४३।। लाभ और व्यय भाव में हरण करने से जो शेष आय हो उसे अपने अपने वल से गुणा कर सर्ववल योग से भाग देने से जो प्राप्त हो वह लाभ और व्यय की अन्तर्दशा का स्वरूप होता है।।४३।। सर्वद्वित्रीषुवेदत्रिपंच सप्त ततः क्रमात् । स्थानांतरे तु भागांशाः सर्वभावेषु कीर्त्तिताः ।।४४।। और तीसरे भाव से दशम भाव पर्यन्त भावों के क्रम से संपूर्ण, आधा, तृतीयांश, पंचमांश, चतुर्थांश, तृतीयांश, पंचमांश, सप्तमांश और शेष दो भावों (प्रथम द्वितीय) में क्रम से सम्पूर्ण और आधा भागांश होता है।।४४।। सर्वत्रिसप्तरामेषु षट् त्र्याग्निद्वियमाः क्रमात् । कालांश अर्ध होरांशः पतयोऽर्धहरा यथा ।।४५।। सर्व, तृतीयांश, सप्तांश, तृतीयांश, पंचमांश, षष्ठांश, तृतीयांश, द्वितीयांश, द्वितीयांश ये कलांश और अर्धहोरांश पति होते हैं।।४५।। इति पाराशरहोरायामुत्तरार्धे एकादशोऽध्यायः।।११।। अथ द्वादशोऽध्यायः।।१२।। पिंडायुषिभेदानि- ग्रहेषु सर्वेषु वलोत्तरेषु स्वोच्चांशगेषुप्रवलस्यवर्गे । दिग्वीर्य चेष्टाबलपूर्तियुक्ते पैण्डेयेषु नीचार्धकृतापहाराः ।।१।। पूर्व में कहे हुये पिंडायु के १२ भेद (१० अध्याय १ श्लो.) में नीचार्धादि अपहार से ।।१।।