बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७४ . वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । और शनि का २०० दिन अष्टम भाव में फल देने का समय है। दूसरे भाव में उक्त दिन संख्या का आधा और २।८ भावो को छोड़कर अन्य भावों में अनुपात द्वारा दिन संख्या ले आकर अवधि कहना चाहिये।।४।। इति पाराशरहोरायामुत्तरार्धेलोकयात्रायाम्भावफलविवेकः सप्तमोऽध्यायः। अथाष्टमोऽध्यायः। अथयोगानां भङ्गयोगः। तेषां भंगमथो वक्ष्ये यथाह कमलासनः । गर्गाय भगवान्सोपि ममाहाहं तव द्विज ।।१।। हे मैत्रेय! पहले ब्रह्माजी ने जो योग भंग योग को गर्ग से कहा था और गर्ग ने मुझसे कहा था उसे मैं तुमसे कहता हूँ।।१।। तथा च रिःफषष्ठाष्टस्थानानां करणाधिपाः । तत्तद्भावस्य भंगस्य कर्त्तारः सति संभवे ।।२।। यदि लग्न से १२।६।८ भावों में बिन्दु देने वाले ग्रह बैठे हों या उन भावों के स्वामी के साथ बैठे हों तो भावों का भंग होता है।।२।। तत्तद्भावोऽष्टवर्गोत्थ संख्या तद्वर्गेणाहता । रविभक्ता ततः शिष्टा राशिर्मेषादिकाभवेत् ।।३।। जिस भाव का विचार करना हो उस भाव के करणांक (बिन्दु संख्या) संख्या से उस भाव के वर्गेणा से गुणकर १२ का भाग देने से शेष मेषादि से राशि होती है।।३।। षष्ठाष्टारिःफे राशिश्श्चेदंग एव प्रकीर्त्तितः । फलं च मुनि संवृद्धं रविभक्तं तथा भवेत् ।।४।। यदि यह राशि ६।८।१२ भाव में हो तो भाव का भंग होता है। यहाँ १२ से भाग देने से जो लब्धांक हो उसे ७ से गुणकर उसमें १८ से भाग देने से दोष राशि होती है यदि यह राशि ६।८।१२ भाव में हो तो योग का भंग होता है।।४।। शिष्टमेवं यदि तदा शत्रुर्भं वाथ भंगदम् । तद्भावानिष्टफलकं तच्छत्रुफलसंगुणम् ।।५।। पूर्वोक्त प्रकार से आई हुई राशि यदि लग्नेश की शत्रुराशि हो वा लग्न से भंग . . युक्त हो तो उस भाव का अनिष्टफल होता है।।५।।