बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथाष्टमोऽध्यायः । ६७५ सप्ताप्तं शिष्टमेवात्र पापरस्मिगुणं ततः । अर्कशिष्टं यदि भवेत्षष्ठरिःफाष्टमेऽषि वा ॥६॥ जो शेष है वह जिस भाव का भंग करता है उस भाव के कष्टफल से उसे गुणकर ७ से योग देना जो शेष रहे उसे शत्रु की राशि से गुण देना उसमें १२ से भाग देने से शेष राशि ६।८।१२ में हो तो उस भाव का भंग कहना ॥६॥ शत्रुर्भ वापिभंगक्षं हानिस्तस्य प्रकीर्त्तिताः । यथोत्तरमितीवाप्तं क्षयवृद्धिस्ततो भवेत् ॥७॥ इस प्रकार से जो भंग आता है उसके १।२।३ के क्रम से क्षय और वृद्धि जानना चाहिये ॥७॥ पुनः प्रकारांतरेण। षष्ठ्यंशे च कलांशे च त्वप्रकाशग्रहोदये । राहुकालसमायोगेतद्भावफलभंगदः ॥८॥ जिस भाव के भंग का विचार करना हो उस भाव के षष्ठ्यंश वा कलांश (षोडशांश) में अप्रकाश में से किसी एक का उदय हो तो भाव का भंगकारक योग होता है॥८॥ अनिष्टाख्यं च रश्मिं च तद्भावफलसंगुणम् । द्वादशाप्तावशेषं च पूर्ववत्फलमीरितम् ॥९॥ अथवा भाव के अरिष्टरश्मि को उस भाव के इष्टवलांक से गुणाकर के उसमें १२ का भाग देने से शेष राशि से पूर्ववत् भाव के भंग योग का विचार करना ॥९॥ यद्यत्फलं प्रोक्तमथोत्तरत्र तत्सर्वमन्यत्र योजनीयम् । भंगं च भंगं च मुनिश्च गर्गः प्रोवाचयद्वन्मुनिपुंगवाहम् ॥१०॥ मैंने जो भावभंग का विचार कहा है सो उत्तरोत्तर जहाँ जहाँ उसका उपयोग हो वहाँ वहाँ देखना, जो भंग गर्ग मुनि ने कहा है उन्हीं भंगों का लक्षण मैंने कहा है॥१०॥ षष्ठ्यंशे च कलांशे च त्रिष्वेकोऽपि यदा न चेत् । अधिमित्रं च मित्रं च भंगभंगः प्रकीर्त्तितः ॥११॥ यदि अभीष्टभाव के षष्ठ्यंश वा षोडशांश में शत्रुराशि में अप्रकाश ग्रहों का उदय, राहु समायोग इसमें से कोई भी एक न हो और अधिमित्र वा मित्र हो तो पूर्वोक्त भंग का परिहार हो जाता है॥११॥ इति पाराशरहोरायामुत्तरार्धे लोकयात्रायां प्रकीर्णकाध्यायः अष्टमः।