बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । सप्तांशं सप्तमस्थस्यप्रक्रियां प्रोच्यतेऽधुना । अंशान्यरस्परहताञ्छेदेनैव विभाजितम् ।।३५।। जो सातवें भाव में हो वह सप्तमांश हरण करता है।।३५।। तत्तद्दंशविभक्तं च स्वस्य स्वस्य समं भवेत् । नीचार्धपक्षे सर्वत्र विधिरेष विधीयते ।।३६।। परस्पर अंश और छेदों का समच्छेद करके आयु को गुणाकर छेद से भाग देने से क्रम से अंतर्दशा का वर्षादि आ जाता है।।३६।। समच्छेदाभावस्थानम् - नीचाभावेऽष्टवर्गोत्थं भावदायेंडशकक्रमे । नायं विधिसमृतस्तत्र बहवश्चेत्तु तेऽखिलम् ।।३७।। पूर्वोक्त हरण विधि नीच रहित, अष्टवर्गायु तथा अंशक क्रम में नहीं करना। यदि उक्त विषय में अनेक ग्रह हों तो वे सम्पूर्ण आयु को देते हैं।।३७।। केन्द्रादिगा ग्रहाः सर्वे ददत्येर्वापहत्य च । अर्धत्र्यंश च पादं च हरणाभाव सम्मतौ ।।३८।। सभी ग्रह केन्द्रादि स्थानों में अर्थात् केन्द्र, पणफर, आपोक्लिम में क्रम से आधा, तृतीयांश और चतुर्थांश तुल्य आयु का ह्रास करते हैं।।३८।। अंतर्दशा के नियम- सर्वाद्धित्रित्रिवेदाश्च त्रिषट्सप्ताष्टपाणयः । स्वक्षैहोरादृकाणेशास्त्रिंशाशेशाद्रि भागपाः ।।३९।। यदि अंतर्दशेश अपनी राशि में हो तो सम्पूर्ण आयु का भोग करता है। यदि वही होरेश हो तो आयुष्य का आधा, द्रेष्काणपति हो तो तृतीयांश त्रिंशांश पति हो तो तृतीयांश सप्तमांश पति हो तो।।३९।। चतुर्थांश, नवांशपति हो तो तृतीयांश, द्वादशांश का अधिपति हो तो षष्ठांश, कालहो रेश हो तो सप्तांश, षष्ठ्यंश का स्वामी हो तो अष्टमांश और षोडशांश का स्वामी हो तो द्वितीयांश भोग करता है। इस प्रकार से सभी अंतर्दशा के स्वामी भोग करते हैं।।४०।। ग्रहाभावात्ततस्तस्मात्स्थितानां द्वादशस्वपि । भावानां च क्रमात्प्रोक्ता भगांशाश्च स्वयंभुवा ।।४१।।