बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः । ६८९ को छोड़कर शेष शत्रुक्षेत्र ग्रहों की आयु का तृतीयांश हास होता है। यदि ग्रह मित्रवर्ग का हो तो तृतीयांश के आधे की ही हानि होती है।।२९।। सुहृद्वर्गगतानां तु तद्दलं हरति स्वकम् । एवं भावेषु सर्वेषु षड्विधं हरणंनहि ।।३०।। इस प्रकार सभी भावों के ६ प्रकार के हरण नहीं होते किन्तु ग्रहों के ही होते हैं।।३०।। अष्टवर्गोत्पन्न अंशायुर्बिहरणम् - हरणं नैव कर्त्तव्यंमदादायेऽष्टवर्गगे । स्वोच्चे च त्रिगुणं प्रोक्तं स्ववर्गे द्विगुणं तथा ।।३१।। अष्टवर्ग से उत्पन्न अंशायु में हरण नहीं करना किन्तु ग्रह उच्च में हो तो आयु को त्रिगुणित कर देना, अपनी राशि में हो तो दूना करना।।३१।। अधिमित्रगृहे सार्धं त्र्यंशं मित्रगृहेयुतम् । अरावप्यरिभावे च त्र्यंशखंडविवर्जितम् ।।३२।। अधिमित्र के गृह में हो तो आयु का आधा उसमें और जोड़ देना, मित्र के गृह में हो तो तृतीयांश जोड़ देना।।३२।। अष्टवर्गोत्थदायेषु प्रोक्तोऽयं विधिरंजसा । भावदायेषु सर्वेषु प्रोक्तोऽयं विधिरुत्तमः ।।३३।। यदि शत्रु के गृह में या अधिशत्रु के गृह में हो तो आयु का तृतीयांश घटा देना। यह विधि अष्टवर्गायु और सभी आयु के साधन में उत्तम है।।३३।। अंतर्दशाप्रकारः- दायगस्य तु सर्वस्य सहगस्य दलं भवेत् । सुतधर्मगयोस्त्र्यंशं पादं मृतिसुखस्थयोः ।।३४।। ग्रह के आयुष्य के तुल्य ही वर्षादि उसकी दशा होती है, उसमें ग्रह के साथ रहने वाले ग्रह का दशापति के आयु का आधा वर्षादि अंतर्दशा होता है। दशापति से ५।९ भाव में ग्रह की आयु के तृतीयांश के तुल्य और आठवें चौथे में स्थित ग्रह की आयु का चतुर्थांश अंतर्दशा होनी है।।३४।।