बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । बहुत से पापग्रह हों तो जो सबमें बली हो उसी का हरण होता है। पापग्रह शुभग्रह दोनों हों तो दोनों के आयुष्य का अन्तर करके जो शेष रहे वही आयुष्य होती है। इसी प्रकार केन्द्रस्थ शुभ पाप के स्थिति के अनुसार समझना।।२४।। राहुयुक्त चन्द्रस्यायु विचारः- सेन्दौ राहौ दशाराहोरानीता मूलदायवत् । चन्द्रायुः पिंडतः शोध्या तद्राहुकरणं स्मृतम् ।।२५।। चन्द्र युक्त राहु हो तो पूर्वोक्तवत् दशा लाकर उसका पिंड बनाकर चन्द्रायु का पिंड बनाकर उसमें शोधन करने से शेष राहु का कारण होता है इसपर से पूर्वोक्तवत् अंशायु के अनुसार ही राहु का आयु वर्ष होता है।।१५।। अंशदायक्रमेणैव तमसोऽब्दाः समीरिताः । तस्मिन्सचन्द्रे तल्लग्नभावसाधनतस्ततः ।।२६।। लग्न में चन्द्रमा और राहु हों तो लग्न के ही समान आयु का साधन करना चाहिये।।२६।। तत्तद्दृष्टिहतं कृत्वा षष्ट्याप्तं धनशोधने । सोदये च सराहिंदावयं न्यायः समीरितः ।।२७।। किन्तु राहु चन्द्र दृष्टियों का परस्पर गुणाकर ६० का भाग देने से जो फल आवे उसे मकरादि में धन और कर्कादि में ऋण करने से स्पष्टायु होती है यदि लग्न में राहु के साथ चन्द्रमा हो तो यह विधि उचित है।।२७।। द्रेष्काणवशात् हानि वृद्धिः। स्थानवृद्धिः क्षयः कार्योद्रेष्काणर्क्षसराशिकम् । अस्तंगतानामर्धं स्याद्विना भृगुसुतं शनिम् ।।२८।। यदि लग्न की राशि और द्रेष्काण की राशि एक ही हो तो भाव स्थफल की वृद्धि होती है और दोनों की भिन्न राशि हो तो भावफल की हानि होती है। शुक्र और शनि को छोड़कर अन्य अस्तंगत ग्रहो की आयु के आधे का ह्रास होता है।।२८।। तयोर्वेदांशहीनं स्याल्पंशोनं शत्रुगस्य तु । अंगारकं वर्जयित्वा शत्रुक्षेत्रगतैग्रहैः ।।२९।। यदि शुक्र शनि अस्त हों तो इनकी आयु का चतुर्थांश हास होता है। भौम