बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः। ६८७ वर्ष और शेष को १२ आदि से गुणाकर भाजक से भाग देने से मास आदि होते हैं। इस प्रकार आये हुये मासादि आयु में पूर्वोक्त वर्ष जोड़ देने से लग्न की वर्षादि आयु होती है।।१९।। लग्ने क्रूरग्रहे सति- क्रूरे क्रूरोदयघ्नं तमष्टोत्तरशतैर्हृतम् । लब्धं चापनयेद्वाये स्वेतथा परमायुषि ।।२०।। लग्न में क्रूरग्रह हो तो लग्न के अंशादि को क्रूरग्रह के वर्तमान नवांश राशितुल्य अंक से गुणाकर १०८ का भाग देने से लब्ध वर्षादि को लग्न की आयु में घटाने से शेष लग्न की स्पष्ट आयु होती है।।२०।। स्वोच्चे मूलत्रिकोणे च लब्धस्यार्धविवर्जयेत् । मित्रेऽधिसुहृदि प्रोक्तं पादोनेनापनायनम् ।।२१।। लग्न में पापग्रह अपने उच्च वा मूल त्रिकोण राशि का हो तो पूर्वोक्त विधि से प्राप्त वर्षादि का आधा ही परमायु में घटाना चाहिये। यदि पापग्रह अपने मित्र या अधिमित्र के गृह में हो तो लब्ध का चतुर्थांश घराना चाहिये।।२१।। भावेष्वेवं विधिः प्रोक्तो वर्गाणामधिपेषु च । तिष्ठन्तौ शुभपापौ चेत्यापोदयविधिः स्मृतः ।।२२।। यह हरण प्रकार लग्न में क्रूरग्रह के रहने से ६ वर्गों के अधिपति क्रूरग्रह हों और लग्न में क्रूरग्रह न हो तब के लिये कहा है। यदि लग्न में शुभ पाप दोनों हों तब भी पापग्रह का ही हरण करना। और लग्न में पापग्रह अधिक हों तो जो उसमें अधिक बली हो उसी का हरण करना चाहिये।।२२।। अष्टमभावे केन्द्रे च शुभपाप योगे- क्रूरेष्टमेष्टमांशेन भावस्याप्यनुपाततः । लग्नाधिपेतराष्टांशं पापो हरति मृत्युगः ।।२३।। अष्टमभाव में पापग्रह हो तो भाव की आयु का अनुपात द्वारा अष्टमांश का हरण होता है। किन्तु लग्नेश की आयु को छोड़कर अन्य ग्रहो की आयु का अष्टमांश हरण होता है।।२३।। वहवश्चेदली सौम्यपापेष्वेवंविधिः स्मृतः । तयोर्दायांतरं दायः केन्द्रस्य च विधीयते ।।२४।।