बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । वहवश्चेद्दली हंति समाश्चेत्प्रथमॊ मतः । अंशक ग्रहयोगे च द्वयोः पापे हरत्युत ।।१५।। उक्त प्रकार एक ग्रहयोग में कहा है यदि बहुत से ग्रह भावसंधि में हों तो जो सबमें बली हो वही आयु का हारक होता है। यदि दो ग्रह पापग्रह और शुभग्रह हों तो उसमें पापग्रह ही आयु का हरण करता है।।१५।। सौम्योऽपि पापवर्गे च स्थितो रिः फादिषट्सुचेत् । त्रिषु भावगतानां च पापानां करणं स्मृतम् ।।१६।। यदि दोनों शुभग्रह ही होवें तो यदि वे पापवर्ग में होकर १२ भाव से आरम्भ कर ६ठे भाव के अन्दर हों तो आयुहारक होते हैं। इसी प्रकार भावगत बारहवें से ६ठे भाव के अन्दर पापग्रह हों तो उनमें केवल सूर्य भौम शनि ही हरण कारक होते हैं। उक्त भाव गत पापग्रहों के फल का भी उत्पादन होता है।।१६।। पूर्वोक्त फलस्य पुष्टिः- कुटुम्बभरणं चापि दुश्चित्तं लाभमेव च । मेधां च प्रतिभां शान्तिं मंदक्रोधं करिष्यति ।।१७।। यदि पापग्रह १२ वें भाव में हो तो कुटुम्ब का पोषक होता है, ११ वें भाव में हो तो दुश्चित्त होता है। १० वें भाव में हो तो लाभ होता है। ९ वें भाव में हो तो धारणात्मिका बुद्धि होती है। ८ वें भाव में हो तो शान्ति का लाभ और ७ वें भाव में हो तो थोड़ा क्रोध होता है।।१७।। अस्तंगतग्रहस्य तथा लग्नस्य आयुः- अस्तंगतानां सर्वेषां दलं दायः स्मृतस्तदा । राशिसंख्यासमाश्चाब्दा लग्नेऽब्जेबलवत्तरम् ।।१८।। अस्तंगत सभी ग्रहों की आयु का आधा ही आयु शेष रहता है। यदि लग्न में चन्द्रमा हों और बलवान् हो तो लग्न की राशि के समान वर्ष लग्न की आयु होती है।।१८।। अंशान् लिप्ताहतान् कृत्वा खखाक्षिभ्यां समाहृताः । शेषा मासादयः प्रोक्ता वर्तमानाब्दयोजने ।।१९।। यदि लग्न में चन्द्रमा न हो अथवा निर्बल हो तो लग्न की राशि को छोड़कर अंश को ६० से गुणाकर उसमें कला को जोड़कर २०० से भाग देने से लब्धि