बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः । ६८५ १-१२ वें भाव से सातवें भाव तक वाम, २- अस्तगत और ३- शत्रु राशिगत का हरण, ४- लग्न में क्रूरग्रह का हरण, ५- चन्द्र सहित राहु का हरण और ६- व्ययस्थ पापग्रह ये ६ प्रकार के आयु के हरण होते हैं॥८९॥ पापो व्ययस्थो हरति सर्वदायं द्विजोत्तम । अथ द्वित्रिचतुः पंचषडंशोनं क्रमादमी ॥९०॥ बारहवें भाव में पापग्रह हो तो सम्पूर्ण आयु की हानि, ग्यारहें भाव में हों तो आयुष्य का आधा, दशम भाव में हो तो आयुष्य का तृतीयांश नवम भाव में हो तो आयुष्य का चतुर्थांश, अष्टमभाव में हो तो आयुष्य का पांचवा भाग और सातवें भाव में हो तो आयु का छठां भाग कम हो जाता है॥९०॥ लाभादिसंस्थिताः खेटा वाभतः प्रक्रियांशृणु। हरंति सौम्याः प्रोक्तार्धं लग्नद्वादश संधिषु ॥९१॥ संधिगत पापग्रह हो तो ज्यो का त्यों हरण होता है यदि शुभग्रह हो तो आधा हरण होता है॥९१॥ पापश्चेत्सकलं हंति शुभो दलमथोत्तरम् । लग्नाद्द्वादशसंधौ च ग्रहान्यायान्निवर्जयेत् ॥९२॥ लग्न से आरंभ कर द्वादश संधियो में पापग्रह हो तो संपूर्ण आयु और शुभग्रह हो तो आयु का आधा क्षय होता है। लग्न से द्वादशभाव की संधियों में पापग्रहों को घटा देवे॥९२॥ राश्यभावे तु भागादीन् दायघ्नान्षष्ठिभाजितात् । दाये द्विघ्ने तु सौम्यस्य राशिरेको दलं यदि ॥९३॥ यदि राशि न हो तो अंशादि को उनके आयु से गुणाकर ६० से भाग देवे जो लब्ध अंशादि हो उरो संधि में घटाने से शेष आयुष्य का हरण फल होता है। यदि शुभग्रह की राशि का अभाव हो तो दाय को दूना कर उससे दाय को गुणाकर ६० का भाग देकर लब्धि को संधि में घटाने से शेष आयुहरण फल होता है॥९३॥ अधिकेनापहत्तंतु क्रमाद्राशिं विना कृतम् । दायद्विगुणया सौम्यो लब्ध्वा वाऽपचयेसमाः ॥९४॥ इस प्रकार से लाया हुआ फल एक राशि का दूसरा दल का इनमें जो अधिक हो उसमें न्यून को घटाना चाहिये। यह आयु के हरण में वर्ष होता है॥९४॥