भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 692, कुल 800 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 692

का १, बुध का ९, गुरु का ८, शुक्र का ९ और शनि का २५ या २६ रश्म्यायु में ध्रुवांक होता है। शेष क्रिया पूर्ववत् समझना ।।७।। अथध्रुवांकेभ्यो आयुसाधनप्रकारः- कलीकृतं ग्रहं व्योमखब्धिनेत्रावशेषितम् । शतद्वयेनाभिभजेद्वदमासादयः क्रमात् ।।८।। जिस ग्रह की आयु लाना हो उसके राश्यादि की कला बनाकर उसमें २४०० से भाग देकर शेष जो बचे उसमें २०० से भाग देने से वर्ष मासादि क्रम से आयु होती है।।८।। उदाहरण- सूर्य राश्यादि ३।१८।२६।३४ की कला ६५०६।३४ इसमें २४०० से भाग देने से शेष १७०६।३४ बचा इसमें २०० का भाग देने से लब्ध ८ और १०६।३४ इसमें ध्रुवांक १९ से गुणाकर २०० से भाग देने से लब्ध १० वर्ष शेष १४।४५ इसे १२ से गुणाकर २०० से भाग देने से लब्ध मास ० शेष १७७।१२ को ३० से गुणाकर २०० से भाग देने से २६ दिन शेष १९६।० को ६० से गुणाकर २०० से भाग देने से लब्ध २४ घटी शेष १६० को ६० से गुणाकर २०० का भाग देने से लब्ध ४८ पल प्राप्त हुआ। इस प्रकार लब्ध वर्षादि १०।०।२६।३४।४८ पूर्व लब्ध वर्ष १० में जोड़ देने से सूर्य की वर्षादि १८।०।२६।३४।४८ पिंडायु हुई। इसी प्रकार अन्य ग्रहों का भी पिंडायु साधन करना। नवांशायुर्दायसाधनम्। सूर्यादिगुणिताच्छेषाद्वृद्धिं कुर्याद्यथोत्तरम् । स्वोच्चहीनं ग्रहं कृत्वा कर्कादिच मृगादि च ।।९।। गृहीत्वातु भुजं कोटिं कृत्वा लिप्तीकृतं तुतम् । हत्वा नवांशदायेन भजेद्भत्रयलिप्तिभिः ।।१०।। सूर्यादि ग्रहों के उच्च राश्यादि को उनमें घटाने से केन्द्र होता है। उसका भुज और कोटि करके, कोटि की कला बनाकर ध्रुवांक से गुणाकर उसमें तीन राशि की कला ५४०० से भाग देने से।।१०।। वत्सराद्या भवंत्येते वर्जयेन्मकरादिके । केन्द्रे नवांशदाये स्वे त्रिघ्ने कर्कटकादिके ।।११।। लब्ध वर्ष होता है शेष को पुनः १२ आदि से गुणाकर ५४०० से भाग देने से लब्ध मासादिक होता है। यदि मकरादि केन्द्र हो तो तीन से गुणे हुये ध्रुवांक में घटाने से और कर्कादि केन्द्र हो तो ध्रुवांक का आधा जोड़ देने से मध्यम नवांशा युदयि होता है।।११।।