बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः । ६८१ नवांशायुर्दाये विशेषः। युंज्यादर्धीकृते तस्मिन् प्रक्रमानुगतो मतः । द्विघ्ने त्वपनयेत्तस्मिन्युज्यादेव दलीकृते ।।१२।। पूर्व साधित नवांशायुर्दाय में यदि केन्द्र मकरादि ६ राशि में हो तो मूल ध्रुवांक को दूना करके उसमें घटा देना और कर्कादि ६ राशि में हो तो मूल ध्रुवांक का आधा कर उसमें जोड़ देने से आयुर्दाय होता है।।१२।। अष्टकवर्गायु साधनम्। निक्षिप्याष्टकवर्गं तु राशिचक्रे तु पूर्ववत् । त्रिकोणैकपशुद्धिं च कृत्वा तु गुणयेद्गुणैः ।।१३।। पहले अष्टक वर्ग बनाकर त्रिकोण शोधन और एकाधिपत्यशोधन करके संख्या को राशि गुणाकर पिंड बनाकर।।१३।। खवन्हि भक्तभब्दाद्याः क्रमाद्भिन्नाष्टवर्गजाः । एवं कृत्वा तु संयोज्य भाप्तसमद्वादयः स्मृताः ।।१४।। उसे (पिंडको) ३० से भाग देने से भिन्नाष्टक वर्गायु होता है। पूर्वोक्त प्रकार से लाये हुये पिंड में २७ का भाग देने से वर्षादि समुदायाष्टक वर्गायु होता है।।१४।। कृत्वा करणदैरेवं स्वोत्पन्नौ दायसंज्ञितौ । प्रत्येकं भिन्नदायोत्थास्त्वैवं त्रिंशद्विदामताः ।।१५।। और इसी प्रकार से करणायु भी लाना चाहिये। पिंडायुर्दाय सप्तग्रहों के ७ प्रकार की, ध्रुवायुर्दाय सप्तग्रहों के ७ प्रकार की, रश्म्यायुर्दाय सप्तग्रहों की ७ प्रकार की, अंशायुर्दाय सप्त ग्रहों के ७ प्रकार की, रेखाष्टक वर्गोत्थ आयु १ प्रकार और करणाष्टकवर्गोत्थ आयु के ३० भेद हुये।।१५।। नवांशायुर्दाये ध्रुवाङ्काः। पंचमूर्छा सप्त रत्नं दश षोडश वारिधिः । नवांशविधितः प्रोक्ता अंत्यात्रोक्तास्तुभादितः ।।१६।। सूर्य का ५, चन्द्र का २१, भौम का ७, बुध का ९, गुरु का १०, शुक्र का १६ और शनि का ४ अंशायु साधन के ध्रुवांक हैं। प्राप्तनवांश से आरम्भ कर अनुलोम विधि से आरम्भ कर अनुलोम विधि से अंतिम नवांश पर्यन्त गणना करना चाहिये।।१६।।