बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः। ६८३ विभजेद्बलयोगेन भावानां दाय एव सः । अथवांशर्कदायेन वर्गेशानां बलेन तु ॥२२॥ भावबल समूह से भाग देने से जो लब्धि हो वही आयुर्दाय होती है। पुनः प्रकारांतर से नवमांशायुर्दाय से परमायुष्य को गुणन कर षड्वर्ग पतियों के बल से भाग देने से वर्षादि भावायुर्दाय होता है।।२२।। स्थानाद्यैश्च समुद्भूतः षड्विधो दायउच्यते ।।२३।। इस प्रकार से भाव, नक्षत्र, नवांश, अष्टकवर्ग, अंश और पैंड्य ये ६ प्रकार के आयुर्दाय भेद कहे।।२३।। इति पाराशर होरायामुत्तरराधे आयुर्दायकथने दशमाध्यायः।।१०।। एकादशोऽध्यायः। आयुषःह्रासवृद्धेःयोगः। आरार्कौ वक्रिणौमृत्युश्चान्योन्यभवनस्थितौ । वेश्मषण्मृत्युत्रिःफस्था णीनेन्दूत्यत्तिपाष्टपाः ।।१।। भौम शनि वक्री होकर परस्पत् एक दूसरे के गृह में हों तो मृत्युकारक होते हैं। यदि क्षीणचंद्र लग्नेश और अठमेश ६।८।१२ स्थान में हों तो मृत्युकारक होते हैं।।१।। अष्टमस्था ग्रहाः सर्वे पापदृष्टियुतास्तु वा । भौममंदर्क्षगाश्चेतु शुभदृष्टिविवर्जिताः ।।२।। अष्टम स्थान में पापग्रह से दृष्टयुत सभी ग्रह मृत्युकारक होते हैं, यदि अष्टमस्थ ग्रह भौम शनि की राशि में हों और शुभग्रह की दृष्टि से हीन हों तो मृत्युकारक होते हैं।।२।। आयुष्ययोगाः। केन्द्रत्रिकोणे च शुभाश्चपापाः षष्ठेत्तीयेच मृत्युसंस्थाः । अष्टोत्तरं जीवति वर्षमायुर्नरो गुणाढ्यो नवतिः सुशीलः ।।३।। शुभग्रह केन्द्र त्रिकोण में हों तो १०८ वर्ष की आयुष्य होती है, पापग्रह ६।३ भाव में हों और आठवें भाव में कोई ग्रह न हो तो ९० वर्ष की आयु होती है।।३।। लग्ने गुरौ दैत्यगुरौ चतुर्थे बुधे सुते षष्ठगते च सूर्ये । स्थानंच शात्रोश्च मृतिं च हित्वा त्वन्ये स्थिताश्चेन्नवतिश्चषट्कः ।