बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ द्वादशोऽध्यायः । ६९३ यदि ग्रह मूलत्रिकोणादि त्रिवर्ग में हो तो पूर्वोक्त रीति से वृद्धि करना नीच शत्रुवर्ग में हो तो हानि करना चाहिये। सम-शत्रुवर्ग में स्थित ग्रह के आयुष्य में हानि वृद्धि नहीं करना चाहिये।।७।। तथा समारिवर्गे च न वृद्धिहरणे तथा । सूर्योदयः क्रमाल्लग्नगताश्चेद्वलवत्तराः ॥८॥ यदि सूर्यादिग्रह अत्यंत बलवान् होकर लग्न में बैठे हों तो क्रम से पिंडायु, ध्रुवायु, समुदायाष्टकवर्गायु, भिन्नाष्टकवर्गायु, प्रक्रमानुगत, अंशकायु और करायु . लेना चाहिये ।।८।। पैंड्योध्रुवोऽष्टवर्गोत्थः प्रक्रमानुगतोऽंशकः । करदायः क्रमाल्लग्ने रव्यादौ तु स्थिते सति ॥९॥ यदि सूर्यादि अपने उच्च राशि के लग्न में हों तो पिंडायु, मूल-त्रिकोण राशि के हों तो स्वरांशायु, स्वराशि के हों तो ध्रुवायु अधिमित्र राशि के हों तो प्रक्रमायु ।।९।। पैंड्यः स्वरांशो ध्रुवदाय एव तत्क्रमांशंश्च तथांशकोत्थः । भिन्नाष्टवर्गः समुदायसंज्ञः करोत्य उच्चादिषु योजनीयः ।।१०।। मित्रक्षेत्र के हों तो अंशायु, शत्रुक्षेत्र के हों तो भिन्नाष्टकवर्गायु अतिशत्रुक्षेत्र के हों तो समुदायाष्टकवर्गायु, स्वनीच के हों तो अंशायुर्दाय लेना चाहिये और समराशि के हों तो अभाव समझना चाहिये ।।१०।। भावानुसारेणायुर्विचारः- ध्रुवः सुखस्थस्यतु सप्तमस्य पैंड्यः स्वरांशः खलुकर्मगस्य। द्वितीय संस्थस्य च पैंड्य उक्तस्तृतीयधीधर्मगतस्य चैव ।।११।। लग्न से चतुर्थभावस्थ ग्रह का ध्रुवायु लेना, सप्तमस्थ का पैंड्य दशमस्थ और द्वितीयभावस्थ का स्वरांशायु, तृतीय पंचमनवमस्थ का पिंडायु ।।११।। षष्ठव्ययस्थस्य तु भिन्नसंज्ञस्तथेत्तरो मृत्युगतस्यचैवम् । पैंड्यः स्वरांशौ ध्रुव आयु उक्तः पैंड्योभवेदायगतस्यचैव ।।१२।। षष्ठस्थ का भिन्नवर्गायु, मृत्युगतस्थ का समुदायाष्टकवर्गायु, एकादशस्थ का पिंडायु, स्वरांश-ध्रुवायु में से किसी एक को लेना और लग्नस्थ का पिंडायु लेना चाहिये।।१२।।