बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । पापा लग्ने चाष्टमे सप्तमे वा सौम्याः षष्ठे कर्मभैरिःफभेवा। नीचाभावे पैण्ड्यदायः प्रदिष्टो मंदे लग्ने स्वोच्चगेच ध्रुवाख्यः ।। २३ ।। अथवा पापग्रह १।८।७ भाव में और शुभग्रह ६।१०।१२ भाव में अपनी नीच राशि को छोड़कर हों तो पिंडायु लेना चाहिये। यदि शनि अपनी उच्चराशि का (तुलाराशि) होकर लग्न में हो तो ध्रुवायु लेना चाहिये।।२३।। विशेष:- वीणायां कार्मुके चक्रे गदायामर्धचन्द्रके । रवौ पैंड्योंऽशको लग्ने ध्रुवश्चन्द्रे च भूमिजे ।। २४ ।। वीणा, कार्मुक, चक्र, गदा, अर्धचन्द्र योगों में कोई योग हो और सूर्य बलवान् हों तो पिंडायु लेना चाहिये। लग्न बली हो तो अंशायु, चन्द्र बली हो तो ध्रुवायु।। २४।। भिन्नाष्टवर्गः सौम्ये तु नक्षत्रांशसमुद्भवः । गुरौ नक्षत्रदायः स्यात्प्रक्रमानुगतः सिते ।। २५ ।। भौम बली हो तो भिन्नाष्टकवर्गायु, बुधबली हो तो नक्षत्रा यु, गुरु बली हो तो नक्षत्रा यु, शुक्र बली हो तो प्रक्रमानुगतायु लेना चाहिये ।। २५ ।। समुदायाष्ट वर्गस्तु मंदे तु बलवत्तरे । वाप्यां पाशे शरे पद्मे समुद्रार्किक्षु क्रमात् ।। २६ ।। शनि बली हो तो समुदायाष्टकवर्गायु लेना चाहिये। वापी पाश, शर, पद्म, समुद्र इनमें कोई योग हो तो सूर्यादि ग्रहों में जो बलवान् हो।। २६।। बलिष्ठेषु नवांशोत्थो ध्रुवः पैंड्यः स्वरांशकः । भिन्नाष्टवर्गो ह्यंशोत्थों नक्षत्रांशक ईरितः ।। २७ ।। उसकी क्रम से नवांशायु, ध्रुवायु, पैंड्यायु, स्वरांशकायु, भिन्नाष्टकायु, अंशायु और नक्षत्रांशायु को लेना।। २७ ।। रज्जौ विहंगे मालायां नले च मुसले क्रमात् । पैंडंचो ध्रुवः क्रमात्रोक्तो रव्याद्रौ बलवत्तरे ।। २८ ।। : रज्जुयोग हो तो पिंडायु, विहंग योग हो तो ध्रुवायु, मालायोग हो तो पिंडायु, नल योग हो तो ध्रुवायु और मुशल योग हो तो पिंडायु लेना चाहिये।। २८ ।। प्रकारान्तरेण- गंडे शक्तौ च शकटे यूपे केदारशूलयोः । प्रक्रमानुगतश्चाथः रश्मिजौ ध्रुवसंज्ञितौ ।। २९ ।।