बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें· अथ द्वादशोऽध्यायः । ६९५ एकस्य विषये द्वौ चेदायुर्योगदलं भवेत् । त्र्यादयश्चेद्युतारूपादिसंख्याप्ताश्च दशा भवेत् ।।१८।। एक ही भाव में दो आयुष्य देनेवाले ग्रह हों तो दोनों की आयु के योग का आधा ग्रहण करना चाहिये और तीन आदि हों तो सभी की आयु के योग को ग्रह संख्या से भाग देकर आयु लेना चाहिये और वही दशा का मान होता है।।१८।। पिण्डायुषः भेदः- रवावुच्चगते चान्ये बलिष्ठा मूलकोणगाः । स्वोच्चस्थेषु बलिष्ठेषु सर्वेषु शशहंसके ।।१९।। यदि सूर्य अपनी उच्चराशि में हो शेष ग्रह बलवान् हों वा अपने-अपने मूलत्रिकोण में हों वा सभी ग्रह बलवान् हों अपनी उच्चराशि में हों, शशयोग, हंसयोग।।१९।। एवं चिरायुषां योगेष्वन्येषु गणितेषु च । चन्द्रयोगेषु त्रिषु च चन्द्रेतु बलवत्तरे ।।२०।। और दीर्घायु योग अन्य दीर्घायु योगकारक योगों में सुनफा अनफा दुरुधरा योग जो चन्द्रमा से होते हैं।।२०।। राजयोगेषु सर्वेषु पैंड्यमाह पराशरः । और चन्द्रमा बलवान् हो तो पिण्डायु लेना ऐसा पाराशर का मत है। प्रकारांतरेण- लग्ने गुरौ कर्मगते च भानौ चन्द्रे सुखे वास्तगतेवलिष्ठे । पूर्णे त्रिकोणोपचये शुभेषु पापेष्वथात्रोक्तमसंस्थितेषु ।।२१।। गुरु लग्न में हो १० वें भाव में सूर्य हो, पूर्ण चन्द्रमा ४ भाव में वा ७ वें भाव में हो और बलवान् हो, शुभग्रह ५।९।३।६।१०।११ भाव में और पापग्रह १।२।१२।८ भावों में हों।।२१।। शुभाश्च केन्द्रे त्रिषडायभेऽन्ये विपर्ययेपैड्यमतः प्रदिष्टम् । रिःफाष्टषष्ठेषु सहस्ररश्मौ भौमे क्रमाच्छीतकरेतुपैण्ड्यः ।।२२।। अथवा शुभग्रह केन्द्र और ३।६।१०।११ भावों में और पापग्रह इससे भिन्न स्थान में हों तो पिण्डायु लेना चाहिये अथवा १२।८।६ भाव में क्रम से सूर्य, भौम और चन्द्रमा हों तो पिण्डायु लेना चाहिये।।२२।।