भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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षोडशवर्गविवेकाध्यायः ७३ कलांशस्य द्वयं ज्ञेयं त्रयं नन्दांशकस्य च। क्षेत्रे सार्धं च त्रितयं चतुः षष्ठ्यंशकस्य हि।।२३।। षोडशांश का २, नवमांश का ३, गृह का १ १/२, षष्ठ्यंश का ४।।२३।। अर्धमर्धं तु शेषाणां ह्येतत् स्वीयमुदाहृतम्। पूर्णं विश्वाबलं विंशो धृतिः स्यादधिमित्रके।।२४।। और शेष वर्गों का आधा आधा (१/२) विंशोपक बल होता है। यह विंशोपक बल अपने वर्ग में पूर्ण २० होता है। अधिमित्र के वर्ग में १८।।२४।। मित्रे पञ्चदश प्रोक्तं समे दश प्रकीर्त्तितम्। शत्रौ सप्ताधिशत्रौ च पञ्च विश्वाबलं भवेत्।।२५।। मित्र के वर्ग में १५, सम के वर्ग में १०, शत्रु के वर्ग में ७ और अधिशत्रु के वर्ग में ५ विंशोपक बल होता है।।२५।। अथ विंशोपकबलस्य स्पष्टीकरणम्- वर्गविश्वास्वविश्वघ्नाः पुनर्विंशतिभाजिताः। विश्वफलोपयोगयं तत्पञ्चोनं फलदो न हि।।२६।। वर्ग के विश्वा को उसी में गुणा कर उसमें २० का भाग देने से स्पष्ट विंशोपक फल कहने योग्य होता है। वह ५ से कम हो तो फल कहने योग्य नहीं होता है।।२६।। तदूर्ध्वं स्वल्पफलदं दशोर्ध्वं मध्यमं स्मृतम्। तिथ्यूर्ध्वं पूर्णफलदं बोध्यं सर्वं खचारिणाम्।।२७।। इसके ऊपर १० तक अल्प फल देने वाला, दश के ऊपर १५ तक मध्यम फल, इसके ऊपर २० तक पूर्ण फल देने वाला होता है। ऐसा सभी ग्रहों का समझना चाहिए ।।२७।। अथ फलकथने विशेषः- अथान्यदपि वक्ष्येऽहं मैत्रेय ! त्वं विधारय। खेटाः पूर्णफलं दद्युः सूर्यात्सप्तमके स्थिताः।।२८।। हे मैत्रेय ! और भी प्रकारों को कहता हूँ, तुम सुनो ! सूर्य से सातवें भाव में ग्रह हो तो पूर्ण फल देता है।।२८।। फलाभावं विजानीयात्समे सूर्यनभश्चरे। मध्येऽनुपातात्सर्वत्र ह्युदयास्तविंशोपकाः।।२९।।