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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

षोडशवर्गविवेकाध्यायः ७३ कलांशस्य द्वयं ज्ञेयं त्रयं नन्दांशकस्य च। क्षेत्रे सार्धं च त्रितयं चतुः षष्ठ्यंशकस्य हि।।२३।। षोडशांश का २, नवमांश का ३, गृह का १ १/२, षष्ठ्यंश का ४।।२३।। अर्धमर्धं तु शेषाणां ह्येतत् स्वीयमुदाहृतम्। पूर्णं विश्वाबलं विंशो धृतिः स्यादधिमित्रके।।२४।। और शेष वर्गों का आधा आधा (१/२) विंशोपक बल होता है। यह विंशोपक बल अपने वर्ग में पूर्ण २० होता है। अधिमित्र के वर्ग में १८।।२४।। मित्रे पञ्चदश प्रोक्तं समे दश प्रकीर्त्तितम्। शत्रौ सप्ताधिशत्रौ च पञ्च विश्वाबलं भवेत्।।२५।। मित्र के वर्ग में १५, सम के वर्ग में १०, शत्रु के वर्ग में ७ और अधिशत्रु के वर्ग में ५ विंशोपक बल होता है।।२५।। अथ विंशोपकबलस्य स्पष्टीकरणम्- वर्गविश्वास्वविश्वघ्नाः पुनर्विंशतिभाजिताः। विश्वफलोपयोगयं तत्पञ्चोनं फलदो न हि।।२६।। वर्ग के विश्वा को उसी में गुणा कर उसमें २० का भाग देने से स्पष्ट विंशोपक फल कहने योग्य होता है। वह ५ से कम हो तो फल कहने योग्य नहीं होता है।।२६।। तदूर्ध्वं स्वल्पफलदं दशोर्ध्वं मध्यमं स्मृतम्। तिथ्यूर्ध्वं पूर्णफलदं बोध्यं सर्वं खचारिणाम्।।२७।। इसके ऊपर १० तक अल्प फल देने वाला, दश के ऊपर १५ तक मध्यम फल, इसके ऊपर २० तक पूर्ण फल देने वाला होता है। ऐसा सभी ग्रहों का समझना चाहिए ।।२७।। अथ फलकथने विशेषः- अथान्यदपि वक्ष्येऽहं मैत्रेय ! त्वं विधारय। खेटाः पूर्णफलं दद्युः सूर्यात्सप्तमके स्थिताः।।२८।। हे मैत्रेय ! और भी प्रकारों को कहता हूँ, तुम सुनो ! सूर्य से सातवें भाव में ग्रह हो तो पूर्ण फल देता है।।२८।। फलाभावं विजानीयात्समे सूर्यनभश्चरे। मध्येऽनुपातात्सर्वत्र ह्युदयास्तविंशोपकाः।।२९।।

७४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् सूर्य के समान ही राशि-अंशादि हो तो शून्य फल देता है और इसके मध्य में हो तो अनुपात से फल समझना चाहिए। ग्रहों के उदय-अस्त का भी विचार कर लेना चाहिए ।।२९।। वर्गविश्वसमं ज्ञेयं फलमस्य द्विजर्षभ। यत्र यत्र फलं बद्ध्वा तत्फलं परिकीर्त्तितम् ।।३०।। हे द्विजश्रेष्ठ ! वर्गविंशोपक के अनुसार जो ग्रह जैसा फल देता हो उसके अनुसार ही उसके फल की कल्पना करें ।।३०।। वर्गविश्वाफलं चादावुदयास्तमः परम्। पूर्ण पूर्णेति पूर्वं स्यात् सर्वं दैवं विचिन्तयेत् ।।३१।। पूर्ण, मध्यम हीन और अल्प में दो-दो भेद हैं। श्लोक २६-२७ के अनुसार प्रत्येक पूर्ण आदि फलों में ५ का भेद है। अतः १५ से १७।। तक पूर्ण १७।। से २० तक अतिपूर्ण, १० से १२ तक मध्यम, १२।। से १५ तक अति मध्यम ।।३१।। हीनं हीनेऽतिहीनं स्यात्स्वल्पाल्पेऽत्यल्पकं स्मृतम्। मध्यं मध्येऽतिमध्यं स्याद्यावत्तस्य दशास्थितिः।।३२।। ३।। से ५ तक हीन, ० से २।। तक अतिहीन, ७।। से १० तक स्वल्प और ५ से ७।। तक अतिस्वल्प होता है। इस प्रकार विंशोपक बल के अनुसार ग्रहों की दशा का फल समझना चाहिए ।।३२।। अथ भावानां केन्द्रादिसंज्ञामाह- अथान्यदपि वक्ष्यामि मैत्रेय ! शृणु सुव्रत ! लग्नतुर्यास्तवियतां केन्द्रसंज्ञा विशेषतः ।।३३।। हे मैत्रेय ! सुव्रत ! लग्न, चतुर्थ, सप्तम और दशम भावों की केन्द्र संज्ञा है ।।३३।। द्विपञ्चरन्ध्रलाभाख्यं ज्ञेयं पणफराभिधम्। त्रिषड्भाग्यव्ययादीनामापोक्लिममिति द्विज ।।३४।। दूसरे, पाँचवें, आठवें और ग्यारहवें भाव की पणफर संज्ञा है। तीसरे, छठें, नवें और बारहवें भाव की आपोक्लिम संज्ञा है ।।३४।। लग्नात्पञ्चमभाग्यस्य कोणसंज्ञा विधीयते। षष्ठाष्टव्ययभावानां दुःसंज्ञास्त्रिकसंज्ञकाः ।।३५।। लग्न, पंचम और नवम भाव को कोण कहते हैं। छठें, आठवें और बारहवें भाव को दुष्ट स्थान और त्रिक कहते हैं ।।३५।।

षोडशवर्गविवेकाध्यायः ७५ चतुरस्रं तुर्यरन्ध्रं कथयन्ति द्विजोत्तम। स्वस्थादुपचयर्क्षाणि त्रिषडायां वराणि हि।।३६।। चौथे और आठवें को चतुरस्र कहते हैं। अपने स्थान से तीसरे, छठें, ग्यारहवें और दशम भाव को उपचय कहते हैं।।३६।। अथ तन्वादिभावानां संज्ञामाह- तनुर्धनं च सहजो बन्धुपुत्रालयस्तथा। युवती रन्ध्रधर्माख्यं कर्मलाभव्ययाः क्रमात्।।३७।। तनु, धन, सहज, बन्धु, पुत्र, अरि, युवती (जाया), रंध्र, धर्म, कर्म, लाभ और व्यय ये क्रम से बारह भावों के नाम हैं।।३७।। सङ्क्षेपेणैतदुदितमन्यद्बुद्ध्यानुसारतः। किञ्चिद्विशेषं वक्ष्यामि यथा ब्रह्ममुखाच्छ्रुतम्।।३८।। यह संक्षेप से कहा है, अन्य बुद्धि के अनुसार जानना। जैसा मैंने ब्रह्माजी के मुख से सुना है उन विशेषों को कह रहा हूँ।।३८।। नवमे च पितुर्ज्ञानं सूर्याच्च नवमेऽथवा। यत्किञ्चिद्दशमे लाभे तत्सूर्याद्दशमे शिवे।।३९।। लग्न से नवम स्थान में पिता का विचार किया जाता है। उसे सूर्य से नवम में भी करना चाहिए। इसी प्रकार लग्न से १०वें और ग्यारहवें में जो विचार किया जाता है वही सूर्य से १०।११ भावों में भी करना चाहिए।।३९।। तुर्ये तनौ धने लाभे भाग्ये यच्चिन्तनं च तत्। चन्द्रात्तूर्ये तनौ लाभे भाग्ये तच्चिन्तयेद्‌ध्रुवम्।।४०।। लग्न से चौथे, दूसरे, ग्यारहवें और भाग्य में जो फल विचार किये जाते हैं वही चन्द्रमा से भी उन्हीं चौथे, दूसरे, ग्यारहवें और भाग्य भावों में करने चाहिए।।४०।। लग्नाद्दुश्चिक्यभवने तत्कुजाद्विक्रमे स्थितात्। विचार्य षष्ठभावस्य बुधात्षष्ठे विचिन्तयेत्।।४१।। लग्न से तीसरे भाव में जो विचार होता है उसे भौम से तीसरे भाव में भी विचारना चाहिए। लग्न से छठें भाव में जो विचार होता है वही बुध से छठें भाव में भी होता है।।४१।।

७६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् . पञ्चमस्य गुरोः पुत्रे जायायाः सप्तमे भृगोः । अष्टमस्य व्ययस्यापि मन्दान्मृत्यौ व्यये तथा ॥४२॥ गुरु से पाँचवें भाव में पुत्र का और शुक्र से सातवें भाव में स्त्री का, शनि से आठवें और बारहवें भाव में उन भावों का विचार करना चाहिए ॥४२॥ यद्भावाद्यत्फलं चिन्त्यं तदीशात्तत्फलं विदुः । ज्ञेयं तस्य फलं तद्धि तत्तच्चिन्त्यं शुभाशुभम् ॥४३॥ जिन-जिन भावों का विचार करना हो वह उन-उन भावों के स्वामियों से भी करना चाहिए ॥४३॥ इति बृहत्पाराशरहोरायाः पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां राशिस्वभावषोडश- वर्गादिकथनं तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ अथ राशिदृष्टिभेदाध्यायः मेषादीनां च राशीनां द्वादशानां पृथक् पृथक् । दृष्टिभेदं प्रवक्ष्यामि शृणु त्वं द्विजसत्तम ॥१॥ हे द्विजसत्तम ! मैं मेषादि १२ राशियों के दृष्टिभेद को पृथक्-पृथक् कह रहा हूँ उसे सुनो ॥१॥ चरः स्थिरान्पश्यतिस्म स्थिरः पश्यति वै चरान् । उभयानुभयं विप्र पश्यतीत्ययमागमः ॥२॥ चर राशियाँ स्थिर राशियों को, स्थिर राशियाँ चर राशियों को और द्विस्वभाव राशियों को देखती हैं, यह आगम है ॥२॥ समीपराशिं सन्त्यक्त्वा राशींस्त्रीननुपश्यति । सर्वोदाहरणं वक्ष्ये शृणु त्वं द्विजसप्तम ॥३॥ इनमें विशेषता यह है कि समीप की राशियों को छोड़कर तीन- तीन राशियों को सभी राशियाँ देखती हैं। इनका उदाहरण मैं कह रहा हूँ ॥३॥ मेषो वृषं परित्यज्य सिंहालिघटकं तथा । अनयैव क्रमेणैव पश्यतिस्म द्विजोत्तम ॥४॥ मेष राशि वृष राशि को छोड़कर सिंह, वृश्चिक, कुम्भ राशि को देखती है। इसी प्रकार क्रम से आगे की राशियाँ भी देखती हैं ॥४॥

राशिदृष्टिभेदाध्यायः ७७ कर्कः सिंहं परित्यज्य वृश्चिकं च घटं वृषम्। तुलापि वृश्चिकं त्यक्त्वा कुम्भं सिंहं तथा वृषम्।।५।। कर्क राशि सिंह को छोड़कर वृश्चिक, कुंभ और वृष को; तुला राशि वृश्चिक को छोड़कर कुंभ, सिंह और वृष को।।५।। नक्रो घटं परित्यज्य मेषं कर्कं तुलां द्विज। सिंहः कर्कं परित्यज्य नक्रं मेषं तुलां द्विज।।६।। कर्क राशि सिंह को छोड़कर वृश्चिक, कुंभ, वृष को, मकर राशि कुंभ राशि को छोड़कर मेष, कर्क, तुला को।।६।। वृश्चिकस्तु तुलां त्यक्त्वा कर्कं मेषं मृगं तथा। कुम्भश्च मकरं त्यक्त्वा मेषं कर्कं तुलां द्विज।।७।। सिंह राशि कर्क राशि को छोड़कर मकर, मेष, तुला को; वृश्चिक राशि तुला को छोड़कर कर्क, मेष, मकर को; कुंभ राशि मकर राशि को छोड़कर मेष, कर्क, तुला को।।७।। युग्मः कन्याधनुर्मीनान् पश्यतीति द्विजोत्तम। कन्या धनुर्मीनयुग्मं पश्यत्येवं न संशयः।।८।। मिथुन राशि कन्या, धन, मीन को; कन्या राशि धन, मीन, मिथुन को।।८।। धनुर्झषयुग्मकन्याः पश्यति द्विजसत्तम। मीनो युग्माङ्गको दण्डान् पश्यति सुमते द्विज।।९।। धन राशि मीन, मिथुन, कन्या को और मीन राशि मिथुन, कन्या और धन राशि को देखती है।।९।। सूर्यादयः क्रमेणैव पश्यन्ति च परस्परम्। राशित्रयं त्रयं विप्र सर्वराशिगता ग्रहाः।।१०।। हे विप्र ! इसी प्रकार सूर्य आदि ग्रह भी तीन-तीन राशियों के क्रम से सभी राशियों को देखते हैं।।१०।। चरेषु संस्थिताः खेटाः पश्यन्ति चरसंस्थितान्। स्थिरेषु संस्थिताः खेटाः पश्यन्ति चरसंस्थितान्।।११।।

७८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् उभयस्थस्तु भान्वादिः पश्यन्त्युभयसंस्थितान् । निकटस्थं विना खेटा निरीक्ष्यन्ते द्विजोत्तम ।।१२।। चर राशि पर बैठा हुआ ग्रह स्थिर राशि पर बैठे हुए ग्रह को, स्थिर राशि पर बैठा हुआ ग्रह चर राशि पर बैठे हुए ग्रह को और द्विस्वभाव राशि पर बैठा हुआ ग्रह द्विस्वभाव राशि पर बैठे हुए ग्रह को देखता है, किन्तु निकटस्थ राशि को छोड़कर ।।११-१२।। दृष्टिचक्रमाह- चक्रन्यासमहं वक्ष्ये यथावद्ब्रह्मणोदितम् । यस्य विज्ञानमात्रेण दृष्टिभेदः प्रकाश्यते ।।१३।। जैसा ब्रह्माजी ने कहा है वैसा ही मैं दृष्टिचक्र को कह रहा हूँ, जिसके जान लेने से दृष्टिभेद समझ में आ जाता है।।१३।। पूर्वे मेषवृषौ लेख्यौ कर्कसिंहौ च दक्षिणे । तुलालिवारुणे विप्र नक्रकुम्भे तथोत्तरे ।।१४।। एक वर्गाकार चक्र बनाकर पूर्व आदि दिशाओं की कल्पना कर पूर्व दिशा में मेष-वृष, दक्षिण में कर्क-सिंह को, तुला-वृश्चिक को पश्चिम में, मकर-कुंभ को उत्तर में ।।१४।। अग्निकोणे तु मिथुनं नैर्ऋत्यामङ्गनां द्विज । वायव्यां धनुषं लेख्यमीशान्यां च झषं लिखेद् ।।१५।। मिथुन को अग्निकोण में, कन्या को नैऋत्य कोण में, वायव्य कोण में धनु को और ईशान्य कोण में मीन को लिखे।।१५।। चतुरस्रं च विन्यासं ज्ञायते द्विजसत्तम । वृत्ताकारं विशेषेण ब्रह्मणा चोदितं पुरा ।।१६।। ब्रह्माजी ने विशेष कर इस चक्र को वृत्ताकार ही कहा है।।१६।। विशेष- १६वें श्लोक के अनुसार स्पष्ट है कि राशियों की सव्यगणना ही ब्रह्मोदिता है तथापि व्यवहार में ऐसा नहीं है, अतः व्यवहार के अनुकूल मीनान्त से अपसव्य गणना ही चक्र में लिखा गया है। ऊपर के १४-१५ श्लोक सव्य गणना के अनुसार ही है। शेष चक्र से स्पष्ट है।

राशिदृष्टिभेदाध्यायः ७९ अपसव्यगणना सव्यगणना ३ २ पूर्व १ १२ १२ १ पूर्व २ ३ ४ उत्तर ५ ११ दक्षिण १० ११ उत्तर १० ४ दक्षिण ५ ६ ७ पश्चिम ८ ९ ९ ८ पश्चिम ७ ६ इति राशिदृष्टिभेदम्। अथ ग्रहाणां दृष्टिचक्रमाह— होराशास्त्रे मित्रदृष्टिः खेटानां च परस्परम्। त्रिदशे च त्रिकोणे च चतुरस्रे च सप्तमे ॥१७॥ होराशास्त्र में ग्रहों की भिन्न-भिन्न दृष्टियाँ कही गई हैं, वो इस प्रकार हैं॥ ग्रह अपने स्थान से ३।१०, ९।५, ४।८।७ स्थान को देखते हैं॥१७॥ शनिर्देवगुरुर्भौमः परे च वीक्षणेऽधिकाः। पदार्धं त्रिपदं पूर्णं वदन्ति गणकोत्तमाः ॥१८॥ शनिपादं त्रिकोणेषु चतुरस्रे द्विपादकम्। त्रिपादं सप्तमे विप्र त्रिदशे पूर्णमेव हि ॥१९॥ किन्तु शनि ९।५ स्थान को १ चरण से, ४।८ स्थान कौ २ चरण से, सातवें को ३ चरण से और ३।१० स्थान को पूर्णदृष्टि सौ देखता है॥१८-१९॥ चतुरस्रे गुरुः पादं सप्तमे च द्विपादकम्। त्रिपादं त्रिदशे विप्र पूर्णं पश्यति कोणभे ॥२०॥ गुरु अपने स्थान से ४।८ भाव को १ चरण सो, ७ स्थान कौ २ चरण से, ३।१० को ३ चरण से और ९।५ स्थान को पूर्णदृष्टि सौ देखता है॥२०॥ सप्तमे पादमेकं च द्विपादं त्रिदशे द्विज। त्रिपादं च त्रिकोणेषु भौमः पूर्णं चतुरस्रगो ॥२१॥

८० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् भौम अपने स्थान से सातवें स्थान को १ चरण से, ३।१० स्थान को २ चरण से, ९।५ स्थान को ३ चरण से और ४।८ स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है॥२१॥ अन्येषां त्रिदशे पादं द्विपादं च त्रिकोणगे। चतुरस्रे त्रिपादं च पूर्णं पश्यति सप्तमे॥२२॥ शेष ग्रह ३।१० स्थान को १ चरण से, ९।५ को १ चरण से, ९।४ को २ चरण से, ४।८ स्थान को ३ चरण से और सातवें स्थान को पूर्णदृष्टि से देखते हैं॥२२॥ ग्रहदृष्टिचक्रम्-

..सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रहः
३।१३३।१०३।१०४।८३।१०९।५स्थान
९।५९।५३।१०९।५९।५४।८स्थान
४।८४।८९।५४।८३।१०४।८स्थान
४।८९।५३।१०स्थान
इति दृष्टिभेदाध्यायः।
इति पाराशरहोरायाः पूर्वखण्डे सुबोधिन्या दृष्टिभेदकं नाम
चतुर्थोऽध्यायः।
अथाऽरिष्टाध्यायः
चतर्विंशतिवर्षाणि यावद्गच्छन्ति जन्मतः।
जन्मारिष्टं तु तावत्स्यादायुर्र्दायं न चिन्तयेत्॥१॥
जन्म से २४ वर्ष की अवस्था तक बालारिष्ट होता है, अतः उक्त अवस्था
तक बालकों के आयु की गणना नहीं करनी चाहिए॥१॥
षष्ठाष्टरिष्फगश्चन्द्रः क्रूरैश्च सह वीक्षितः।
जातस्य मृत्युदः सद्यस्त्वष्टवर्षैः शुभेक्षितः॥२॥
इसलिए बालारिष्ट को कह रहा हूँ- जन्मलग्न से ६।८।१२ भाव में
चन्द्रमा हो और क्रूरग्रही से देखा जाता हो तो बालक की शीघ्र ही मृत्यु
होती है। यदि चन्द्रमा को शुभग्रह देखता हो तो ८वें वर्ष में अरिष्ट होता
है॥२॥

अथाऽरिष्टाध्यायः ८१ शशिवन्मृत्युदः सौम्याश्चेद्वक्राः क्रूरवीक्षिताः। शिशोर्जातस्य मासेन लग्ने सौम्यविवर्जिते ।।३।। यदि वक्री शुभग्रह ६।८।१२ भाव में हों और क्रूरग्रहों से देखे जाते हों और शुभग्रह जन्म लग्न में न हों तो बालक की एक मास में मृत्यु हो जाती है।।३।। यस्य जन्मनिधीस्थाः स्युः सूर्यार्केन्दुकुजाभिधाः। तस्य त्वाशु जनित्री च भ्राता च निधनं लभेत् ।।४।। जिसके जन्मांग में ५वें स्थान में सूर्य, शनि, चन्द्रमा और मंगल हों तो उस बालक के माता और भाई की मृत्यु होती है।।४।। पापेक्षिते युतो भौमो लग्नगो न शुभेक्षितः। मृत्युदस्त्वष्टमस्थोऽपि सौरेणार्केण वा पुनः ।।५।। यदि पापग्रह से युत और पापग्रह से देखा जाता हुआ भौम जन्मलग्न में हो और शुभग्रह से न देखा जाता हो तो मृत्युकारक होता है और आठवें भाव में शनि या रवि हों तो भी मृत्युकारक होते हैं।।५।। चन्द्रसूर्यग्रहे राहुश्चन्द्रसूर्ययुतो यदि। शनिभौमेक्षितं लग्नं पक्षमेकं स जीवति ।।६।। चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहण के समय का जन्म हो, लग्न में राहु, चन्द्रमा, सूर्य हों और शनि को भौम देखता हो तो बालक एक पक्ष (१५ दिन) तक जीता है।।६।। कर्मस्थाने स्थितः सौरिः शत्रुस्थाने कलानिधिः। क्षितिजो सप्तमस्थाने समात्रा म्रियते शिशुः ।।७।। लग्न से दशम भाव में शनि हो, छठे भाव में चन्द्रमा हो, सातवें भाव में भौम हो तो माता के साथ ही बालक की मृत्यु होती है।।७।। लग्ने भास्करपुत्रश्च निधने चन्द्रमा यदि। तृतीयस्थो यदा जीवः स याति यममन्दिरम् ।।८।। लग्न में शनि हो, आठवें भाव में चन्द्रमा हो और तीसरे भाव में गुरु हो तो बालक की मृत्यु होती है।।८।। होरायां नवमे सूर्यः सप्तमस्थः शनैश्चरः। एकादशे गुरुः शुक्रो मासमेकं स जीवति ।।९।।

८२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अपने होरा में सूर्य नवम भाव में हो, सातवें भाव में शनि हो और ग्यारहवें भाव में गुरु-शुक्र हों तो १ मास में बालक की मृत्यु होती है।।९।। व्यये सर्वे ग्रहा नेष्टा सूर्यशुकेन्द्रराहवः। विशेषात्राशकर्त्तारो दृष्ट्या वा भङ्गकारिणः।।१०।। १२वें भाव में सभी ग्रह अशुभ होते हैं, विशेषकर सूर्य, शुक्र, चन्द्रमा और राहु। इनकी दृष्टि भी हानिकर होती है।।१०।। पापान्वितः शशी धर्मे द्यूनलग्नगतो यदि। शुभैरवीक्षितयुतस्तदा मृत्युप्रदः शिशोः।।११।। पापग्रह से युत चन्द्रमा ९वें या ७वें भाव में हो और शुभग्रह से दृष्ट- युत न हो तो बालक की मृत्यु होती है।।११।। सन्ध्यायां चन्द्रहोरायां गण्डान्ते निधनाय वै। प्रत्येकं चन्द्रपापैश्च केन्द्रगैः स्याद्दिनाशनम् ।।१२।। प्रातः संध्या या सायं संध्या में चन्द्रमा की होरा में जन्म हो और गंडात हो तो बालक की मृत्यु होती है। प्रत्येक केन्द्रों में पापग्रह चन्द्रमा से युत हो तो भी मृत्यु होती है।।१२।। रवेस्तु मण्डलार्द्धास्तात्सायं सन्ध्या त्रिनाडिका। तथैवार्द्धोदयात्पूर्वं प्रातः सन्ध्या त्रिनाडिका ।।१३।। सूर्यबिंब के आधा अस्त हो जाने के बाद ३ दंड सायं संध्या और सूर्यबिंब के आधा उदय होने के पश्चात् ३ घटी प्रातः संध्या होती है। ।१३ ।। चक्रपूर्वापरार्धेषु क्रूरसौम्येषु कीटभे। लग्नगे निधनं यान्ति नात्र कार्या विचारणा ।।१४।। यदि सभी पापग्रह चक्र के पूर्वार्ध में हों और परार्ध में शुभग्रह हों और कीटलग्न (कर्कराशि) जन्मलग्न हो तो बालक की मृत्यु होती है।।१४।। व्ययशत्रुगतैः क्रूरैर्मृत्युद्रव्यगतैरपिं। पापमध्यगते लग्ने सत्यमेव मृतिं वदेत् ।।१५।। यदि १२वें, छठे, ८वें और दूसरे भाव में पापग्रह हों, जन्मलग्न पापग्रह के मध्य में हो तो बालक की मृत्यु होती है।।१५।।

अथाऽरिष्टाध्यायः ८३ लग्नसप्तमगौ पापौ चन्द्रोऽपि क्रूरसंयुतः। यदा त्ववीक्षितः सौम्यैः शीघ्रान्मृत्युर्भवेत्तदा ।। १६ ।। यदि लग्न और सातवें भाव में पापग्रह हों और चन्द्रमा भी क्रूरग्रह से युक्त हो और शुभ ग्रहों से न देखा जाता हो तो शीघ्र ही मृत्यु होती है।।१६।। क्षीणे शशिनि लग्नस्थे पापैः केन्द्राष्टसंस्थितैः । यो जातो मृत्युमाप्नोति स विप्रेश न संशयः ।।१७।। क्षीण चन्द्रमा लग्न में हो, केन्द्र और आठवें भाव में पापग्रह हों तो बालक की मृत्यु होती है।।१७।। पापयोर्मध्यगश्चन्द्रो लग्नरन्ध्रान्त्यसप्तगः। अचिरान्मृत्युमाप्नोति यो जातः स शिशुस्तथा ।।१८।। दो पापग्रहों के मध्य में होकर चन्द्रमा लग्न, आठवें या बारहवें या सातवें भाव में हो तो बालक की मृत्यु होती है।।१८।। पापद्वयमध्यगे चन्द्रे लग्ने समवस्थिते । सप्तमष्टमेन पापेन मात्रा सह मृतः शिशुः ।।१९।। दो पापग्रहों के मध्य में चन्द्रमा लग्न में हो, सातवें, आठवें भाव में पापग्रह हों तो माता के साथ बालक की मृत्यु होती है।।१९।। शनैश्चरार्कभौमेषु रिष्फधर्माष्टमेषु च। शुभैरवीक्ष्यमाणेषु यो जातो निधनं गतः।।२०।। शनि, सूर्य, भौम क्रम से १२, ९, ८ वें भाव में हों और शुभग्रहों से न देखे जाते हों तो शीघ्र ही मृत्यु होती है।।२०।। यद्द्रेष्काणे च यामित्रे यस्य स्याद्दारुणो ग्रहः । क्षीणचन्द्रो विलग्नस्थो सद्यो हरति जीवितम् ।।२१।। जिसके लग्न के द्रेष्काण और सातवें भाव में पापग्रह हों और क्षीण चन्द्रमा लग्न में हो तो शीघ्र ही मृत्यु होती है।।२१।। आपोक्लिमस्थिताः सर्वे ग्रहाः बलविवर्जिताः । षण्मासं वा द्विमासं वा तस्यायुः समुदाहृतम् ।।२२।। सभी ग्रह निर्बल होकर आपोक्लिम (३।६।९।१२) भाव में हों तो ६ मास या दो मास की आयु होती है।।२२।।

८४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अथ मातृकष्टम्- चन्द्रमा यदि पापानां त्रितयेन प्रदृश्यते। मातृनाशो भवेत्तस्य शुभदृष्टे शुभं भवेत्।।२३।। यदि जन्म समय चन्द्रमा को तीन पापग्रह देखते हों तो माता की मृत्यु होती है। शुभग्रह देखते हों तो शुभ होता है।।२३।। धने राहुर्बुधः शुक्रः सौरिः सूर्यो यथास्थितः। यस्य मातुः भवेन्मृत्युर्मृते पितरि जायते।।२४।। धन भाव में राहु, बुध, शुक्र, शनि और सूर्य हों तो उसके पिता के मरने के बाद माता की मृत्यु होती है।।२४।। पापात्सप्तमरन्ध्रस्थे चन्द्रे पापसमन्विते। बलिभिः पापकैर्दृष्टे जातो भवति मातृहा।।२५।। पापग्रह से सातवें, आठवें भाव में पापग्रह से युत चन्द्रमा हो, बलवान् पापग्रहों से देखा जाता हो तो उसकी माता की मृत्यु होती है।।२५।। उच्चस्थो वाथ नीचस्थः सप्तमस्थो यदा रविः। मातृहीनो भवेद्बालः अजाक्षीरेण जीवति।।२६।। जिसके जन्म समय में लग्न में सातवें भाव में उच्चराशि में या नीच राशि में सूर्य हो तो उसके माता की मृत्यु होती है और वह बालक बकरी के दूध से जीता है।।२६।। चन्द्राच्चतुर्थगः पापो रिपुक्षेत्रे यदा भवेत्। तदा मातृवधं कुर्यात्केन्द्रे यदि शुभो न चेत्।।२७।। यदि अपने शत्रु की राशि का पापग्रह चन्द्रमा से चौथे हो और केन्द्र में शुभग्रह न हों तो माता की मृत्यु होती है।।२७।। द्वादशे रिपुभावे च यदा पापग्रहो भवेत्। तदा मातृवधं विन्द्याच्चतुर्थे दशमे पितुः।।२८।। जन्मलग्न से १२ वें, छठे स्थान में पापग्रह हों तो माता का विनाश होता है। चौथे, दशवें स्थान में पापग्रह हो तो पिता की हानि होती है।।२८।। लाभे क्रूरो व्यये क्रूरो धने सौम्यस्तथैव च। सप्तमे भवने क्रूरः परिवारक्षयङ्करः।।२९।।

अथाऽरिष्टाध्यायः ८५ लग्न और बारहवें भाव में पापग्रह हों, दूसरे भाव में शुभग्रह हों तथा सातवें भाव में क्रूरग्रह हों तो परिवार का नाश करने वाला होता है ।।२९।। लग्नस्थे च गुरौ सौरी धने राहौ तृतीयगे। इति चेज्जन्मकाले स्यान्माता तस्य न जीवति ।।३०।। लग्न में गुरु और शनि हों तथा दूसरे या तीसरे भाव में राहु हो तो माता नहीं जीती है।।३०।। क्षीणचन्द्रात् त्रिकोणस्थैः पापैः सौम्यविवर्जितैः। माता परित्यजेद्बालं षण्मासाच्च न संशयः ।।३१।। क्षीण चन्द्रमा से त्रिकोण (९।५) में पापग्रह हों, शुभग्रह न हों तो ६ मास के अन्दर ही माता बालक को त्याग देती है।।३१।। एकांशकस्थौ मन्दारौ यत्र कुत्र स्थितौ यदा। शशिकेन्द्रगतौ तौ वा द्विमातृभ्यां च जीवति ।।३२।। एक ही नवमांश में शनि और भौम हों और कहीं बैठे हों अथवा चन्द्रमा से केन्द्र में हों तो बालक दो माताओं से जीता है।।३२।। अथ पितृकष्टम्— लग्ने सौरिर्मदे भौमः षष्ठस्थाने च चन्द्रमाः। इति चेज्जन्मकाले स्यात्पिता तस्य न जीवति ।।३३।। यदि जन्मलग्न में शनि, सातवें स्थान में भौम और छठे स्थान में चन्द्रमा हों तो उसका पिता नहीं जीता है।।३३।। लग्ने जीवो धने मन्दरविभौमबुधस्तथा। विवाहसमये तस्य जातस्य म्रियते पिता ।।३४।। लग्न में गुरु हो, दूसरे स्थान में शनि, रवि, भौम, बुध हों तो उसके विवाह के समय में पिता की मृत्यु होती है।।३४।। सूर्यः पापेन संयुक्तः सूर्यो वा पापमध्यगः। सूर्यात्सप्तमगः पापस्तदा पितृवधं भवेत् ।।३५।। सूर्य पापग्रह के साथ हो अथवा पापग्रहों के मध्य में हो और सूर्य से सातवें भाव में पापग्रह हो तो पिता की मृत्यु होती है।।३५।। सप्तमे भवने सूर्यः कर्मस्थो भूमिनन्दनः। राहुर्व्यये च यस्यैव पिता कष्टेन जीवति ।।३६।।

८६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् सातवें स्थान में सूर्य हो, दशम स्थान में भौम और बारहवें स्थान में राहु हों तो पिता कष्ट से जीता है।।३६।। दशमस्थो यदा भौमः शत्रुक्षेत्रसमन्वितः । म्रियते तस्य जातस्य पिता शीघ्रं न संशयः ।।३७।। यदि दशम स्थान में शत्रु की राशि में भौम हो तो पिता की शीघ्र ही मृत्यु होती है।।३७।। रिपुस्थाने यदा चन्द्रो लग्नस्थाने शनैश्चरः । कुजश्च सप्तमस्थाने पिता तस्य न जीवति ।।३८।। यदि छठें स्थान में चन्द्रमा, लग्न में शनि और सातवें में भौम हो तो पिता नहीं जीता है।।३८।। भौमांशकस्थिते भानौ स्वपुत्रेण निरीक्षिते ।।३९।। प्राग्जन्मनो निवृत्तिः स्यान्मृत्युर्वापि शिशोः पितुः ।।३९।। भौम के नवांश में सूर्य हो और शनि से देखा जाता हो तो पिता नहीं जीता है।।३९।। पाताले चाम्बरे पापा द्वादशे च यदा स्थितौ । पितरं मातरं हत्वा देशाद्देशान्तरं व्रजेत् ।।४०।। चतुर्थ, दशम और बारहवें स्थान में पापग्रह हों तो माता-पिता दोनों की मृत्यु होती है।।४०।। राहुजीवौ रिपुक्षेत्रे लग्ने वाथ चतुर्थके। त्रयोविंशतिमे वर्षे पुत्रस्तातं न पश्यति ।।४१।। राहु, गुरु छठे, लग्न या चौथे भाव में हों तो २३वें वर्ष में पुत्र पिता को नहीं देखता है।।४१।।* भानुः पिता च जन्तूनां चन्द्रो माता तथैव च । पापदृष्टियुतो भानुः पापमध्यगतोऽपि वा । पित्रारिष्टं विजानीयाच्छिशोर्जातस्य निश्चितम् ।।४२।। यदि सूर्य पापग्रह से दृष्ट-युत होकर पापग्रह के मध्य में हो तो बालक के पिता का नाश होता है।।४२।। भानोः षष्ठाष्टमर्क्षस्थैः पापैः सौम्यविवर्जितैः । चतुरस्रगतैर्वापि पित्रारिष्टं विनिर्दिशेत् ।।४३।। *जीव के पिताकारक सूर्य और मातृकारक चन्द्रमा होता है।

• अथारिष्टभङ्गाध्यायः ८७ सूर्य से छठे, आठवें भाव में पापग्रह हों तो पिता की मृत्यु होती है। सूर्य से छठे, आठवें भाव में पापग्रह हों, शुभग्रह न हों या चौथे, आठवें भाव में पापग्रह हों तो पिता को अरिष्ट होता है।।४३।। इत्यरिष्टाध्यायः। अथारिष्टभङ्गाध्यायः एकोऽपि ज्ञार्यशुक्राणां लग्नात्केन्द्रगतो यदि। अरिष्टं निखिलं हन्ति तिमिरं भास्करो यथा।।४४।। यदि बुध, गुरु, शुक्र में से एक लग्न भी केन्द्र में हो तो संपूर्ण अरिष्ट का नाश हो जाता है; जैसे सूर्य के उदय से अंधकार का नाश हो जाता है।।४४।। एक एव बली जीवो लग्नस्थो रिष्टसञ्चयः। हन्ति पापक्षयं भक्त्या प्रणाम इव शूलिनः।।४५।। यदि केवल गुरु ही बली होकर लग्न में हो तो अरिष्ट-समूह का नाश हो जाता है, जैसे भक्तिपूर्वक शंकर को प्रणाम करने से पापसमूह नष्ट हो जाते हैं।।४५।। एक एव विलग्नेशः केन्द्रसंस्थो बलान्वितः। अरिष्टं निखिलं हन्ति पिनाकी त्रिपुरं यथा।।४६।। एक लग्नेश ही बली होकर केन्द्र में हो तो अरिष्ट का नाश होता है, जैसे शंकरजी ने त्रिपुर राक्षस का नाश किया था।।४६।। शुक्लपक्षे क्षपाजन्म लग्ने सौम्यनिरीक्षिते। विपरीतं कृष्णपक्षे तथारिष्टविनाशनम्।।४७।। शुक्लपक्ष से रात्रि में जन्म हो और लग्न को शुभ ग्रह देखता हो तथा कृष्णपक्ष में दिन का जन्म हो और लग्न को शुभ ग्रह देखता हो तो अरिष्ट का नाश होता है।।४७।। व्ययस्थाने यदा सूर्यस्तुला लग्ने तु जायते। जीवेत्स शतवर्षाणि दीर्घायुर्बालको भवेत्।।४८।। यदि तुला लग्न में जन्म हो और बारहवें स्थान में सूर्य हों तो बालक १०० वर्ष तक जीता है।।४८।। गुरुभौमौ यदा युक्तौ गुरुदृष्टोऽथवा कुजः। हत्वारिष्टमशेषं च जनन्याः शुभकृद्भवेत्।।४९।।

८८ · बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् गुरु-भौम एक भाव में हों अथवा गुरु से भौम देखा जाता हो तो अरिष्टों का नाश होता है और माता को सुख होता है।।४९।। चतुर्थदशमे पापः सौम्यमध्ये यदा भवेत्। पितुः सौख्यकरो योगः शुभैःकेन्द्रत्रिकोणगैः ।।५०।। शुभग्रह के मध्य में चौथे, दशम भाव में पापग्रह हों, केन्द्रत्रिकोण में शुभग्रह हों तो पिता को सुख होता है।।५०।। लग्नाच्चतुर्थे यदि पापखेटः केन्द्रत्रिकोणे सुरराजमन्त्री । कुलद्वयानन्दकरो प्रसूतः दीर्घायुरारोग्यसमन्वितश्च ।।५१।। लग्न से चौथे स्थान में पापग्रह हों, केन्द्र व त्रिकोण में गुरु हों तो बालक दोनों कुलों (माता-पिता) को सुखदायक होता है।।५१।। सौम्यान्तरगतैः पापैः शुभैः केन्द्रत्रिकोणगैः । सद्यो नाशयतेऽरिष्टं तद्भावोत्थफलं न तत् ।।५२।। शुभग्रह के मध्य में पापग्रह हों और शुभग्रह केन्द्रत्रिकोण में हो तो अरिष्ट का नाश होता है और उस भाव के फलों की वृद्धि होती है।।५२।। इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यामरिष्टभङ्गाध्यायः पञ्चमः। इत्यरिष्टभङ्गाध्यायः। अथाऽप्रकाशग्रहफलाध्यायः तत्रादौ धूमग्रहफलम्- शूरो विमलनेत्रांशः सुस्तब्धो निर्घृणः खलः। मूत्तिस्थे धूमसम्प्राप्ते गाढशेषो नरः सदा।।१।। यदि धूमग्रह प्रथम भाव में हो तो जातक शूरवीर, सुन्दर नेत्र और कंधे वाला, मूर्ख, निर्लज्ज, दुष्ट तथा बड़ा क्रोधी होता है।।१।। रोगी धनी तु हीनाङ्गो राज्यापहृतमानसः। द्वितीये धूमसम्प्राप्ते मन्दप्राज्ञो नपुंसकः।।२।। दूसरे भाव में हो तो रोगी, धनी, विकलांग, राजा से अपहृत चित्तवाला, मंदबुद्धि और नपुंसक होता है।।२।। मतिमान् शौर्यसङ्ग्रामे इष्टचित्तः प्रियंवदः। धूमे सहजभावस्थे धनाढ्यो धनवान् भवेत् ।।३।। तीसरे भाव में हो तो बुद्धिमान्, पराक्रमी, शुद्धचित्त, मीठा बोलने वाला, धनसंयुक्त धनी होता है।।३।।

अथाऽप्रकाशग्रहफलाध्यायः ८९ कलत्राङ्गपरित्यक्तो नित्यं मनसि दुःखितः। चतुर्थे धूमसम्प्राप्ते सर्वशास्त्रार्थचिन्तकः।।४।। चौथे भाव में हो तो स्त्री से त्यागा हुआ नित्य दुःखी, सभी शास्त्रों का विचार करने वाला होता है।।४।। स्वल्पापत्यो धनैर्हीनो धूमे पञ्चमसंस्थिते। गुरुतः सर्वभक्षं च सुहृन्मन्त्रविवर्जितः।।५।। पाँचवें भाव में हो तो थोड़े संतानवाला, निर्धन, गौरव से युक्त, सर्वभक्षी, अच्छे मित्रों से रहित होता है।।५।। बलवाञ्छत्रुवधको धूमे च रिपुभावगे। बहुतेजोयुतः ख्यातः सदा रोगविवर्जितः।।६।। छठे भाव में हो तो बलवान्, शत्रु को मारने वाला, तेजस्वी, प्रसिद्ध और रोगहीन होता है।।६।। निर्धनः सततं कामी परदारेषु कोविदः। धूमे सप्तमभे प्राप्ते निस्तेजः सर्वदा भवेत् ।।७।। सातवें भाव में धूम हो तो निर्धन, निरंतर कामी, परस्त्रीगामी और तेजहीन होता है।।७।। विक्रमेण परित्यक्तः सोत्साही सत्यसङ्गरः। अप्रियो निष्ठुरः स्वामी धूमे मृत्युगते सति।।८।। आठवें भाव में हो तो पराक्रम से त्यागी, उत्साही सत्संकल्पवाला, अप्रिय, निष्ठुर स्वामी होता है।।८।। सुतसौभाग्यसम्पन्नो धनी मानी दयान्वितः। धर्मस्थाने स्थिते धूमे धनवान्बन्धुवत्सलः।।९।। नवम भाव में हो तो पुत्र, भाग्य संयुक्त, धनी, मानी, दयालु, धनी और बंधुप्रिय होता है।।९।। सुतसौभाग्यसंयुक्तः सन्तोषी मतिमान् सुखी। कर्मस्थे मानवो नित्यं धूमे सत्यपदस्थितः।।१०।। दशम भाव में हो तो पुत्र तथा सौभाग्य संयुक्त, संतोषी, बुद्धिमान् और सुखी होता है।।१०।। धनधान्यहिरण्याढ्यो रूपवांश्च कलान्वितः। धूमे लाभगते चैव विनीतो गीतकोविदः।।११।।

९० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ग्यारहवें भाव में हो तो धन, धान्य और सुवर्ण से युक्त, रूपवान् तथा कला को जानने वाला होता है।।११।। पतितः पापकर्मा च द्वादशे धूमसङ्गते। परदारेषु संसक्तो व्यसनी निर्घृणः शठी।।१२।। बारहवें भाव में हो तो पतित, पाप करने वाला परस्त्रीगामी, व्यसनी और निर्लज्ज होता है।।१२।। इति धूमफलम्। अथ पातफलम् मूर्तौ च पाते सम्प्राप्ते दुःखैनाङ्गप्रपीडितः। क्रूरो घातकरो मूर्खो द्वेष्यो बन्धुजनेन च।।१।। यदि लग्न में पात हो तो दुःखी, अंग से पीडित, क्रूर प्रकृति, मूर्ख, भाइयो से द्वेष करने वाला होता है।।१।। जिह्मोऽतिपित्तवान् भोगी धनस्थे पातसंज्ञके। निर्घृणश्च कृतघ्नश्च दुष्टात्मा पापकृत्तथा।।२।। दूसरे भाव में हो तो कुटिल, अत्यंत पित्तप्रकृति, भोगी, निर्लज्ज, कृतघ्न, दुष्टात्मा और पापी होता है।।२।। स्थिरप्रज्ञो रणी दाता धनाढ्यो राजवल्लभः। सहजे पापसम्प्राप्ते सेनाधीशो भवेन्नरः।।३।। तीसरे भाव में हो तो सेनापति, स्थिरबुद्धि, संगति करने वाला, दाता, धनी, राजा का प्रियपात्र होता है।।३।। बन्धव्याधिसमायुक्तः सुतसौभाग्यवर्जितः। चतुर्थगो यदा पातस्तदा स्यान्मनुजश्च सः।।४।। चौथे भाव में हो तो बंधन और व्याधि संयुक्त, पुत्र और भाग्य से हीन मनुष्य होता है।।४।। दरिद्रो रूपसंयुक्तः पातो पञ्चमगो यदि। कफपित्तानिलैर्युक्तो निष्ठुरो निरपत्रपः।।५।। पाँचवें भाव में हो तो मनुष्य दरिद्र, रूपवान्, कफ, पित्त और वायु प्रकृति से संयुक्त, क्रूर और निर्लज्ज होता है।।५।। शत्रुहन्ता सुपुष्टश्च सर्व्वास्त्राणां च ग्राहकः। कलासु निपुणः शान्तः पाते शत्रुगते सति।।६।।

अथ पातफलम् ९१ छठे भाव में हो तो जातक शत्रु का नाशक, शरीर से पुष्ट, सभी अस्त्रों को धारण करने वाला, कला में निपुण और शान्त होता है॥६॥ धनदारसुतैस्त्यक्तः स्त्रीजितः कष्टजीविकः। पाते कलत्रगे कामी निर्लज्जः परसौहदः॥७॥ सातवें भाव में पात हो तो धन, स्त्री, पुत्र से हीन, स्त्री से जीता हुआ, कष्ट से जीविका प्राप्त करने वाला, कामी और शत्रुओं से मित्रता करने वाला होता है॥७॥ विकलाङ्गो विरूपश्च दुर्भगो द्विजनिन्दकः। मृत्युस्थाने स्थिते पाते रक्तपीडापरिप्लुतः॥८॥ आठवें भाव में पात हो तो अंगहीन, कुरूप, दरिद्र, ब्राह्मणनिंदक और रक्तपीड़ा से युक्त होता है॥८॥ बहुव्यापारको नित्यं बहुमित्रो बहुश्रुतः। धर्मभे पातसम्प्राप्तो स्त्रीप्रियज्ञः प्रियंवदः॥९॥ नवम भाव में पात हो तो अनेक व्यापार को करने वाला, अनेक मित्रों वाला, अनेक शास्त्रों को जानने वाला, स्त्री को प्रिय और प्रिय बोलने वाला होता है॥९॥ सश्रीको धर्मकृच्छ्रान्तो धर्मकार्येषु कोविदः। कर्मस्थे पातसम्प्राप्ते महाप्राज्ञो विचक्षणः॥१०॥ दशम भाव में पात हो तो लक्ष्मी से युक्त, धार्मिक, शान्त, धर्मकार्य में पंडित होता है॥१०॥ प्रभूतधनवान्मानी सत्यवादी दृढव्रतः। अश्वाढ्यो गीतसंसक्तः पाते लाभगते सति॥११॥ एकादश भाव में हो तो बहुत बड़ा धनी, मानी, सत्य बोलने वाला, दृढ़- प्रतिज्ञ, घोड़ा रखने वाला, गीत को जानने वाला होता है॥११॥ क्रोधी च बहुकर्माढ्यो व्यङ्गो धर्मस्य द्वेषकः। व्ययस्थाने गते पाते विद्वेषी निजबन्धुभिः॥१२॥ बारहवें भाव में हो तो क्रोधी, अनेक कार्यों में संलग्न, अंगहीन, धर्मनिंदक और अपने बंधुओं से विद्वेष करने वाला होता है॥१२॥ इति पातफलम्।

९२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अथ परिधिफलम् विद्वान् सत्यरतः शान्तो धनवान्पुत्रवाञ्छुचिः। दाता च परिधौ मूर्त्तौ जायते गुरुवत्सलः ।।१।। यदि परिधि लग्न में हो तो जातक विद्वान्, सत्य बोलने वाला, शान्तचित्त, धनवान्, पुत्रवान्, पवित्र, दाता और गुरुभक्त होता है।।१।। ईश्वरो रूपवान् भोगी सुखी धर्मपरायणः। धनस्थे परिधौ प्राप्ते प्रभुर्भवति मानवः ।।२।। दूसरे भाव में हो तो समर्थ, रूपवान्, भोगी, सुखी, धर्मपरायण और समर्थ होता है।।२।। स्त्रीवल्लभः सुरूपाङ्गो देवस्वजनसङ्गतः। तृतीये परिधौ भृत्यो गुरुभक्तिसमन्वितः ।।३।। तीसरे भाव में हो तो स्त्रीप्रिय, सुन्दर रूप, धन से पूर्ण, देवता और आपस के लोगों के अनुकूल, नौकर और गुरुभक्त होता है।।३।। परिधौ सुखभावस्थे विस्मितं त्वरिमङ्गलम्। अक्रूरं त्वथ सम्पूर्ण कुरुते गीतकोविदः ।।४।। चौथे भाव में हो तो विस्मयालु, शत्रु का मंगल करने वाला, सरल और गीतज्ञ होता है।।४।। लक्ष्मीवान् शीलवान् कान्तः प्रियवान् धर्मवत्सलः ।।५।। पञ्चमे परिधौ जाते स्त्रीणां भवति वल्लभः ।।५।। पाँचवें भाव में हो तो लक्ष्मीवान्, शीलवान्, सुन्दर, धार्मिक और स्त्रियों का प्रिय होता है।।५।। व्यक्तोऽर्थपुत्रवान् भोगी सर्वसत्त्वहिते रतः। परिधौ रिपुभावस्थे शत्रुहा जायते नरः ।।६।। छठे भाव में हो तो प्रसिद्ध धनी, पुत्रवान्, भोगी, सभी का हित करने वाला, शत्रुयुक्त किन्तु शत्रु का नाश करने वाला होता है।।६।। स्वल्पापत्यसुखैर्हीनो मन्दप्रज्ञः सुनिष्ठुरः। परिधौ द्यूनभावस्थे स्त्रीणां व्याधिश्च जायते ।।७।। यदि परिधि सातवें भाव में हो तो थोड़े संतान सुख से हीन, मंदबुद्धि एवं निष्ठुर और उसकी स्त्री रोगी होती है।।७।।