बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशवर्गविवेकाध्यायः ७५ चतुरस्रं तुर्यरन्ध्रं कथयन्ति द्विजोत्तम। स्वस्थादुपचयर्क्षाणि त्रिषडायां वराणि हि।।३६।। चौथे और आठवें को चतुरस्र कहते हैं। अपने स्थान से तीसरे, छठें, ग्यारहवें और दशम भाव को उपचय कहते हैं।।३६।। अथ तन्वादिभावानां संज्ञामाह- तनुर्धनं च सहजो बन्धुपुत्रालयस्तथा। युवती रन्ध्रधर्माख्यं कर्मलाभव्ययाः क्रमात्।।३७।। तनु, धन, सहज, बन्धु, पुत्र, अरि, युवती (जाया), रंध्र, धर्म, कर्म, लाभ और व्यय ये क्रम से बारह भावों के नाम हैं।।३७।। सङ्क्षेपेणैतदुदितमन्यद्बुद्ध्यानुसारतः। किञ्चिद्विशेषं वक्ष्यामि यथा ब्रह्ममुखाच्छ्रुतम्।।३८।। यह संक्षेप से कहा है, अन्य बुद्धि के अनुसार जानना। जैसा मैंने ब्रह्माजी के मुख से सुना है उन विशेषों को कह रहा हूँ।।३८।। नवमे च पितुर्ज्ञानं सूर्याच्च नवमेऽथवा। यत्किञ्चिद्दशमे लाभे तत्सूर्याद्दशमे शिवे।।३९।। लग्न से नवम स्थान में पिता का विचार किया जाता है। उसे सूर्य से नवम में भी करना चाहिए। इसी प्रकार लग्न से १०वें और ग्यारहवें में जो विचार किया जाता है वही सूर्य से १०।११ भावों में भी करना चाहिए।।३९।। तुर्ये तनौ धने लाभे भाग्ये यच्चिन्तनं च तत्। चन्द्रात्तूर्ये तनौ लाभे भाग्ये तच्चिन्तयेद्ध्रुवम्।।४०।। लग्न से चौथे, दूसरे, ग्यारहवें और भाग्य में जो फल विचार किये जाते हैं वही चन्द्रमा से भी उन्हीं चौथे, दूसरे, ग्यारहवें और भाग्य भावों में करने चाहिए।।४०।। लग्नाद्दुश्चिक्यभवने तत्कुजाद्विक्रमे स्थितात्। विचार्य षष्ठभावस्य बुधात्षष्ठे विचिन्तयेत्।।४१।। लग्न से तीसरे भाव में जो विचार होता है उसे भौम से तीसरे भाव में भी विचारना चाहिए। लग्न से छठें भाव में जो विचार होता है वही बुध से छठें भाव में भी होता है।।४१।।