बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् . पञ्चमस्य गुरोः पुत्रे जायायाः सप्तमे भृगोः । अष्टमस्य व्ययस्यापि मन्दान्मृत्यौ व्यये तथा ॥४२॥ गुरु से पाँचवें भाव में पुत्र का और शुक्र से सातवें भाव में स्त्री का, शनि से आठवें और बारहवें भाव में उन भावों का विचार करना चाहिए ॥४२॥ यद्भावाद्यत्फलं चिन्त्यं तदीशात्तत्फलं विदुः । ज्ञेयं तस्य फलं तद्धि तत्तच्चिन्त्यं शुभाशुभम् ॥४३॥ जिन-जिन भावों का विचार करना हो वह उन-उन भावों के स्वामियों से भी करना चाहिए ॥४३॥ इति बृहत्पाराशरहोरायाः पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां राशिस्वभावषोडश- वर्गादिकथनं तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ अथ राशिदृष्टिभेदाध्यायः मेषादीनां च राशीनां द्वादशानां पृथक् पृथक् । दृष्टिभेदं प्रवक्ष्यामि शृणु त्वं द्विजसत्तम ॥१॥ हे द्विजसत्तम ! मैं मेषादि १२ राशियों के दृष्टिभेद को पृथक्-पृथक् कह रहा हूँ उसे सुनो ॥१॥ चरः स्थिरान्पश्यतिस्म स्थिरः पश्यति वै चरान् । उभयानुभयं विप्र पश्यतीत्ययमागमः ॥२॥ चर राशियाँ स्थिर राशियों को, स्थिर राशियाँ चर राशियों को और द्विस्वभाव राशियों को देखती हैं, यह आगम है ॥२॥ समीपराशिं सन्त्यक्त्वा राशींस्त्रीननुपश्यति । सर्वोदाहरणं वक्ष्ये शृणु त्वं द्विजसप्तम ॥३॥ इनमें विशेषता यह है कि समीप की राशियों को छोड़कर तीन- तीन राशियों को सभी राशियाँ देखती हैं। इनका उदाहरण मैं कह रहा हूँ ॥३॥ मेषो वृषं परित्यज्य सिंहालिघटकं तथा । अनयैव क्रमेणैव पश्यतिस्म द्विजोत्तम ॥४॥ मेष राशि वृष राशि को छोड़कर सिंह, वृश्चिक, कुम्भ राशि को देखती है। इसी प्रकार क्रम से आगे की राशियाँ भी देखती हैं ॥४॥