बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
DevanagariHindipublished800 पृष्ठ
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८० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् भौम अपने स्थान से सातवें स्थान को १ चरण से, ३।१० स्थान को २ चरण से, ९।५ स्थान को ३ चरण से और ४।८ स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है॥२१॥ अन्येषां त्रिदशे पादं द्विपादं च त्रिकोणगे। चतुरस्रे त्रिपादं च पूर्णं पश्यति सप्तमे॥२२॥ शेष ग्रह ३।१० स्थान को १ चरण से, ९।५ को १ चरण से, ९।४ को २ चरण से, ४।८ स्थान को ३ चरण से और सातवें स्थान को पूर्णदृष्टि से देखते हैं॥२२॥ ग्रहदृष्टिचक्रम्-
| .. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ग्रहः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | ३।१३ | ३।१० | ७ | ३।१० | ४।८ | ३।१० | ९।५ | स्थान |
| २ | ९।५ | ९।५ | ३।१० | ९।५ | ७ | ९।५ | ४।८ | स्थान |
| ३ | ४।८ | ४।८ | ९।५ | ४।८ | ३।१० | ४।८ | ७ | स्थान |
| ४ | ७ | ७ | ४।८ | ७ | ९।५ | ७ | ३।१० | स्थान |
| इति दृष्टिभेदाध्यायः। | ||||||||
| इति पाराशरहोरायाः पूर्वखण्डे सुबोधिन्या दृष्टिभेदकं नाम | ||||||||
| चतुर्थोऽध्यायः। | ||||||||
| अथाऽरिष्टाध्यायः | ||||||||
| चतर्विंशतिवर्षाणि यावद्गच्छन्ति जन्मतः। | ||||||||
| जन्मारिष्टं तु तावत्स्यादायुर्र्दायं न चिन्तयेत्॥१॥ | ||||||||
| जन्म से २४ वर्ष की अवस्था तक बालारिष्ट होता है, अतः उक्त अवस्था | ||||||||
| तक बालकों के आयु की गणना नहीं करनी चाहिए॥१॥ | ||||||||
| षष्ठाष्टरिष्फगश्चन्द्रः क्रूरैश्च सह वीक्षितः। | ||||||||
| जातस्य मृत्युदः सद्यस्त्वष्टवर्षैः शुभेक्षितः॥२॥ | ||||||||
| इसलिए बालारिष्ट को कह रहा हूँ- जन्मलग्न से ६।८।१२ भाव में | ||||||||
| चन्द्रमा हो और क्रूरग्रही से देखा जाता हो तो बालक की शीघ्र ही मृत्यु | ||||||||
| होती है। यदि चन्द्रमा को शुभग्रह देखता हो तो ८वें वर्ष में अरिष्ट होता | ||||||||
| है॥२॥ |