भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 800 में से

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पृष्ठ 79

अथाऽरिष्टाध्यायः ८१ शशिवन्मृत्युदः सौम्याश्चेद्वक्राः क्रूरवीक्षिताः। शिशोर्जातस्य मासेन लग्ने सौम्यविवर्जिते ।।३।। यदि वक्री शुभग्रह ६।८।१२ भाव में हों और क्रूरग्रहों से देखे जाते हों और शुभग्रह जन्म लग्न में न हों तो बालक की एक मास में मृत्यु हो जाती है।।३।। यस्य जन्मनिधीस्थाः स्युः सूर्यार्केन्दुकुजाभिधाः। तस्य त्वाशु जनित्री च भ्राता च निधनं लभेत् ।।४।। जिसके जन्मांग में ५वें स्थान में सूर्य, शनि, चन्द्रमा और मंगल हों तो उस बालक के माता और भाई की मृत्यु होती है।।४।। पापेक्षिते युतो भौमो लग्नगो न शुभेक्षितः। मृत्युदस्त्वष्टमस्थोऽपि सौरेणार्केण वा पुनः ।।५।। यदि पापग्रह से युत और पापग्रह से देखा जाता हुआ भौम जन्मलग्न में हो और शुभग्रह से न देखा जाता हो तो मृत्युकारक होता है और आठवें भाव में शनि या रवि हों तो भी मृत्युकारक होते हैं।।५।। चन्द्रसूर्यग्रहे राहुश्चन्द्रसूर्ययुतो यदि। शनिभौमेक्षितं लग्नं पक्षमेकं स जीवति ।।६।। चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहण के समय का जन्म हो, लग्न में राहु, चन्द्रमा, सूर्य हों और शनि को भौम देखता हो तो बालक एक पक्ष (१५ दिन) तक जीता है।।६।। कर्मस्थाने स्थितः सौरिः शत्रुस्थाने कलानिधिः। क्षितिजो सप्तमस्थाने समात्रा म्रियते शिशुः ।।७।। लग्न से दशम भाव में शनि हो, छठे भाव में चन्द्रमा हो, सातवें भाव में भौम हो तो माता के साथ ही बालक की मृत्यु होती है।।७।। लग्ने भास्करपुत्रश्च निधने चन्द्रमा यदि। तृतीयस्थो यदा जीवः स याति यममन्दिरम् ।।८।। लग्न में शनि हो, आठवें भाव में चन्द्रमा हो और तीसरे भाव में गुरु हो तो बालक की मृत्यु होती है।।८।। होरायां नवमे सूर्यः सप्तमस्थः शनैश्चरः। एकादशे गुरुः शुक्रो मासमेकं स जीवति ।।९।।

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