बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 85, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ें• अथारिष्टभङ्गाध्यायः ८७ सूर्य से छठे, आठवें भाव में पापग्रह हों तो पिता की मृत्यु होती है। सूर्य से छठे, आठवें भाव में पापग्रह हों, शुभग्रह न हों या चौथे, आठवें भाव में पापग्रह हों तो पिता को अरिष्ट होता है।।४३।। इत्यरिष्टाध्यायः। अथारिष्टभङ्गाध्यायः एकोऽपि ज्ञार्यशुक्राणां लग्नात्केन्द्रगतो यदि। अरिष्टं निखिलं हन्ति तिमिरं भास्करो यथा।।४४।। यदि बुध, गुरु, शुक्र में से एक लग्न भी केन्द्र में हो तो संपूर्ण अरिष्ट का नाश हो जाता है; जैसे सूर्य के उदय से अंधकार का नाश हो जाता है।।४४।। एक एव बली जीवो लग्नस्थो रिष्टसञ्चयः। हन्ति पापक्षयं भक्त्या प्रणाम इव शूलिनः।।४५।। यदि केवल गुरु ही बली होकर लग्न में हो तो अरिष्ट-समूह का नाश हो जाता है, जैसे भक्तिपूर्वक शंकर को प्रणाम करने से पापसमूह नष्ट हो जाते हैं।।४५।। एक एव विलग्नेशः केन्द्रसंस्थो बलान्वितः। अरिष्टं निखिलं हन्ति पिनाकी त्रिपुरं यथा।।४६।। एक लग्नेश ही बली होकर केन्द्र में हो तो अरिष्ट का नाश होता है, जैसे शंकरजी ने त्रिपुर राक्षस का नाश किया था।।४६।। शुक्लपक्षे क्षपाजन्म लग्ने सौम्यनिरीक्षिते। विपरीतं कृष्णपक्षे तथारिष्टविनाशनम्।।४७।। शुक्लपक्ष से रात्रि में जन्म हो और लग्न को शुभ ग्रह देखता हो तथा कृष्णपक्ष में दिन का जन्म हो और लग्न को शुभ ग्रह देखता हो तो अरिष्ट का नाश होता है।।४७।। व्ययस्थाने यदा सूर्यस्तुला लग्ने तु जायते। जीवेत्स शतवर्षाणि दीर्घायुर्बालको भवेत्।।४८।। यदि तुला लग्न में जन्म हो और बारहवें स्थान में सूर्य हों तो बालक १०० वर्ष तक जीता है।।४८।। गुरुभौमौ यदा युक्तौ गुरुदृष्टोऽथवा कुजः। हत्वारिष्टमशेषं च जनन्याः शुभकृद्भवेत्।।४९।।