बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ · बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् गुरु-भौम एक भाव में हों अथवा गुरु से भौम देखा जाता हो तो अरिष्टों का नाश होता है और माता को सुख होता है।।४९।। चतुर्थदशमे पापः सौम्यमध्ये यदा भवेत्। पितुः सौख्यकरो योगः शुभैःकेन्द्रत्रिकोणगैः ।।५०।। शुभग्रह के मध्य में चौथे, दशम भाव में पापग्रह हों, केन्द्रत्रिकोण में शुभग्रह हों तो पिता को सुख होता है।।५०।। लग्नाच्चतुर्थे यदि पापखेटः केन्द्रत्रिकोणे सुरराजमन्त्री । कुलद्वयानन्दकरो प्रसूतः दीर्घायुरारोग्यसमन्वितश्च ।।५१।। लग्न से चौथे स्थान में पापग्रह हों, केन्द्र व त्रिकोण में गुरु हों तो बालक दोनों कुलों (माता-पिता) को सुखदायक होता है।।५१।। सौम्यान्तरगतैः पापैः शुभैः केन्द्रत्रिकोणगैः । सद्यो नाशयतेऽरिष्टं तद्भावोत्थफलं न तत् ।।५२।। शुभग्रह के मध्य में पापग्रह हों और शुभग्रह केन्द्रत्रिकोण में हो तो अरिष्ट का नाश होता है और उस भाव के फलों की वृद्धि होती है।।५२।। इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यामरिष्टभङ्गाध्यायः पञ्चमः। इत्यरिष्टभङ्गाध्यायः। अथाऽप्रकाशग्रहफलाध्यायः तत्रादौ धूमग्रहफलम्- शूरो विमलनेत्रांशः सुस्तब्धो निर्घृणः खलः। मूत्तिस्थे धूमसम्प्राप्ते गाढशेषो नरः सदा।।१।। यदि धूमग्रह प्रथम भाव में हो तो जातक शूरवीर, सुन्दर नेत्र और कंधे वाला, मूर्ख, निर्लज्ज, दुष्ट तथा बड़ा क्रोधी होता है।।१।। रोगी धनी तु हीनाङ्गो राज्यापहृतमानसः। द्वितीये धूमसम्प्राप्ते मन्दप्राज्ञो नपुंसकः।।२।। दूसरे भाव में हो तो रोगी, धनी, विकलांग, राजा से अपहृत चित्तवाला, मंदबुद्धि और नपुंसक होता है।।२।। मतिमान् शौर्यसङ्ग्रामे इष्टचित्तः प्रियंवदः। धूमे सहजभावस्थे धनाढ्यो धनवान् भवेत् ।।३।। तीसरे भाव में हो तो बुद्धिमान्, पराक्रमी, शुद्धचित्त, मीठा बोलने वाला, धनसंयुक्त धनी होता है।।३।।