भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 800 में से

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पृष्ठ 87

अथाऽप्रकाशग्रहफलाध्यायः ८९ कलत्राङ्गपरित्यक्तो नित्यं मनसि दुःखितः। चतुर्थे धूमसम्प्राप्ते सर्वशास्त्रार्थचिन्तकः।।४।। चौथे भाव में हो तो स्त्री से त्यागा हुआ नित्य दुःखी, सभी शास्त्रों का विचार करने वाला होता है।।४।। स्वल्पापत्यो धनैर्हीनो धूमे पञ्चमसंस्थिते। गुरुतः सर्वभक्षं च सुहृन्मन्त्रविवर्जितः।।५।। पाँचवें भाव में हो तो थोड़े संतानवाला, निर्धन, गौरव से युक्त, सर्वभक्षी, अच्छे मित्रों से रहित होता है।।५।। बलवाञ्छत्रुवधको धूमे च रिपुभावगे। बहुतेजोयुतः ख्यातः सदा रोगविवर्जितः।।६।। छठे भाव में हो तो बलवान्, शत्रु को मारने वाला, तेजस्वी, प्रसिद्ध और रोगहीन होता है।।६।। निर्धनः सततं कामी परदारेषु कोविदः। धूमे सप्तमभे प्राप्ते निस्तेजः सर्वदा भवेत् ।।७।। सातवें भाव में धूम हो तो निर्धन, निरंतर कामी, परस्त्रीगामी और तेजहीन होता है।।७।। विक्रमेण परित्यक्तः सोत्साही सत्यसङ्गरः। अप्रियो निष्ठुरः स्वामी धूमे मृत्युगते सति।।८।। आठवें भाव में हो तो पराक्रम से त्यागी, उत्साही सत्संकल्पवाला, अप्रिय, निष्ठुर स्वामी होता है।।८।। सुतसौभाग्यसम्पन्नो धनी मानी दयान्वितः। धर्मस्थाने स्थिते धूमे धनवान्बन्धुवत्सलः।।९।। नवम भाव में हो तो पुत्र, भाग्य संयुक्त, धनी, मानी, दयालु, धनी और बंधुप्रिय होता है।।९।। सुतसौभाग्यसंयुक्तः सन्तोषी मतिमान् सुखी। कर्मस्थे मानवो नित्यं धूमे सत्यपदस्थितः।।१०।। दशम भाव में हो तो पुत्र तथा सौभाग्य संयुक्त, संतोषी, बुद्धिमान् और सुखी होता है।।१०।। धनधान्यहिरण्याढ्यो रूपवांश्च कलान्वितः। धूमे लाभगते चैव विनीतो गीतकोविदः।।११।।