बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ग्यारहवें भाव में हो तो धन, धान्य और सुवर्ण से युक्त, रूपवान् तथा कला को जानने वाला होता है।।११।। पतितः पापकर्मा च द्वादशे धूमसङ्गते। परदारेषु संसक्तो व्यसनी निर्घृणः शठी।।१२।। बारहवें भाव में हो तो पतित, पाप करने वाला परस्त्रीगामी, व्यसनी और निर्लज्ज होता है।।१२।। इति धूमफलम्। अथ पातफलम् मूर्तौ च पाते सम्प्राप्ते दुःखैनाङ्गप्रपीडितः। क्रूरो घातकरो मूर्खो द्वेष्यो बन्धुजनेन च।।१।। यदि लग्न में पात हो तो दुःखी, अंग से पीडित, क्रूर प्रकृति, मूर्ख, भाइयो से द्वेष करने वाला होता है।।१।। जिह्मोऽतिपित्तवान् भोगी धनस्थे पातसंज्ञके। निर्घृणश्च कृतघ्नश्च दुष्टात्मा पापकृत्तथा।।२।। दूसरे भाव में हो तो कुटिल, अत्यंत पित्तप्रकृति, भोगी, निर्लज्ज, कृतघ्न, दुष्टात्मा और पापी होता है।।२।। स्थिरप्रज्ञो रणी दाता धनाढ्यो राजवल्लभः। सहजे पापसम्प्राप्ते सेनाधीशो भवेन्नरः।।३।। तीसरे भाव में हो तो सेनापति, स्थिरबुद्धि, संगति करने वाला, दाता, धनी, राजा का प्रियपात्र होता है।।३।। बन्धव्याधिसमायुक्तः सुतसौभाग्यवर्जितः। चतुर्थगो यदा पातस्तदा स्यान्मनुजश्च सः।।४।। चौथे भाव में हो तो बंधन और व्याधि संयुक्त, पुत्र और भाग्य से हीन मनुष्य होता है।।४।। दरिद्रो रूपसंयुक्तः पातो पञ्चमगो यदि। कफपित्तानिलैर्युक्तो निष्ठुरो निरपत्रपः।।५।। पाँचवें भाव में हो तो मनुष्य दरिद्र, रूपवान्, कफ, पित्त और वायु प्रकृति से संयुक्त, क्रूर और निर्लज्ज होता है।।५।। शत्रुहन्ता सुपुष्टश्च सर्व्वास्त्राणां च ग्राहकः। कलासु निपुणः शान्तः पाते शत्रुगते सति।।६।।