बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथाऽरिष्टाध्यायः ८५ लग्न और बारहवें भाव में पापग्रह हों, दूसरे भाव में शुभग्रह हों तथा सातवें भाव में क्रूरग्रह हों तो परिवार का नाश करने वाला होता है ।।२९।। लग्नस्थे च गुरौ सौरी धने राहौ तृतीयगे। इति चेज्जन्मकाले स्यान्माता तस्य न जीवति ।।३०।। लग्न में गुरु और शनि हों तथा दूसरे या तीसरे भाव में राहु हो तो माता नहीं जीती है।।३०।। क्षीणचन्द्रात् त्रिकोणस्थैः पापैः सौम्यविवर्जितैः। माता परित्यजेद्बालं षण्मासाच्च न संशयः ।।३१।। क्षीण चन्द्रमा से त्रिकोण (९।५) में पापग्रह हों, शुभग्रह न हों तो ६ मास के अन्दर ही माता बालक को त्याग देती है।।३१।। एकांशकस्थौ मन्दारौ यत्र कुत्र स्थितौ यदा। शशिकेन्द्रगतौ तौ वा द्विमातृभ्यां च जीवति ।।३२।। एक ही नवमांश में शनि और भौम हों और कहीं बैठे हों अथवा चन्द्रमा से केन्द्र में हों तो बालक दो माताओं से जीता है।।३२।। अथ पितृकष्टम्— लग्ने सौरिर्मदे भौमः षष्ठस्थाने च चन्द्रमाः। इति चेज्जन्मकाले स्यात्पिता तस्य न जीवति ।।३३।। यदि जन्मलग्न में शनि, सातवें स्थान में भौम और छठे स्थान में चन्द्रमा हों तो उसका पिता नहीं जीता है।।३३।। लग्ने जीवो धने मन्दरविभौमबुधस्तथा। विवाहसमये तस्य जातस्य म्रियते पिता ।।३४।। लग्न में गुरु हो, दूसरे स्थान में शनि, रवि, भौम, बुध हों तो उसके विवाह के समय में पिता की मृत्यु होती है।।३४।। सूर्यः पापेन संयुक्तः सूर्यो वा पापमध्यगः। सूर्यात्सप्तमगः पापस्तदा पितृवधं भवेत् ।।३५।। सूर्य पापग्रह के साथ हो अथवा पापग्रहों के मध्य में हो और सूर्य से सातवें भाव में पापग्रह हो तो पिता की मृत्यु होती है।।३५।। सप्तमे भवने सूर्यः कर्मस्थो भूमिनन्दनः। राहुर्व्यये च यस्यैव पिता कष्टेन जीवति ।।३६।।