बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथाऽरिष्टाध्यायः ८३ लग्नसप्तमगौ पापौ चन्द्रोऽपि क्रूरसंयुतः। यदा त्ववीक्षितः सौम्यैः शीघ्रान्मृत्युर्भवेत्तदा ।। १६ ।। यदि लग्न और सातवें भाव में पापग्रह हों और चन्द्रमा भी क्रूरग्रह से युक्त हो और शुभ ग्रहों से न देखा जाता हो तो शीघ्र ही मृत्यु होती है।।१६।। क्षीणे शशिनि लग्नस्थे पापैः केन्द्राष्टसंस्थितैः । यो जातो मृत्युमाप्नोति स विप्रेश न संशयः ।।१७।। क्षीण चन्द्रमा लग्न में हो, केन्द्र और आठवें भाव में पापग्रह हों तो बालक की मृत्यु होती है।।१७।। पापयोर्मध्यगश्चन्द्रो लग्नरन्ध्रान्त्यसप्तगः। अचिरान्मृत्युमाप्नोति यो जातः स शिशुस्तथा ।।१८।। दो पापग्रहों के मध्य में होकर चन्द्रमा लग्न, आठवें या बारहवें या सातवें भाव में हो तो बालक की मृत्यु होती है।।१८।। पापद्वयमध्यगे चन्द्रे लग्ने समवस्थिते । सप्तमष्टमेन पापेन मात्रा सह मृतः शिशुः ।।१९।। दो पापग्रहों के मध्य में चन्द्रमा लग्न में हो, सातवें, आठवें भाव में पापग्रह हों तो माता के साथ बालक की मृत्यु होती है।।१९।। शनैश्चरार्कभौमेषु रिष्फधर्माष्टमेषु च। शुभैरवीक्ष्यमाणेषु यो जातो निधनं गतः।।२०।। शनि, सूर्य, भौम क्रम से १२, ९, ८ वें भाव में हों और शुभग्रहों से न देखे जाते हों तो शीघ्र ही मृत्यु होती है।।२०।। यद्द्रेष्काणे च यामित्रे यस्य स्याद्दारुणो ग्रहः । क्षीणचन्द्रो विलग्नस्थो सद्यो हरति जीवितम् ।।२१।। जिसके लग्न के द्रेष्काण और सातवें भाव में पापग्रह हों और क्षीण चन्द्रमा लग्न में हो तो शीघ्र ही मृत्यु होती है।।२१।। आपोक्लिमस्थिताः सर्वे ग्रहाः बलविवर्जिताः । षण्मासं वा द्विमासं वा तस्यायुः समुदाहृतम् ।।२२।। सभी ग्रह निर्बल होकर आपोक्लिम (३।६।९।१२) भाव में हों तो ६ मास या दो मास की आयु होती है।।२२।।