बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७०० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । दशवर्गरीत्याभाग्योदयस्यविचारः- स्वेष्वन्येषु तु वर्गेषु ज्योतिर्विद्दशसुस्थितैः । अद्यंशो राशिलिप्तायाः सप्तांशः संप्रकीर्त्तितः ।।५।। हे ज्योतिर्विद्! दशवर्गों में यदि भाग्यस्थित ग्रह अपने वर्ग में हो तो स्वदेश में अन्यथा परदेश में भाग्योदय होता है। ग्रह की राशि अंश की कला बनाकर उसमें सात से भाग देने से लब्ध सप्तांश।।५।। अष्टादशर्ष्कांशांस्तु कलांश इति कीर्त्तितः । षट्यंश एवं षष्ट्यंश क्रमेण पतयः स्मृताः ।।६।। १८ से भाग देकर उसमें पुनः १२ का भाग देने से लब्ध षोडशांश होता है। ६० से भाग देने से जो लब्ध हो उसे षष्ट्यंश कहते हैं।।६।। भाग्यत्रिकोणोपगतैः शुभं स्याद्भाग्यंतु केन्द्रोपगतैः शुभैश्च।।७।। लग्न और चन्द्र से जो नवम स्थान उससे ५।९।१।४।७।१० स्थान में शुभग्रह हों तो शुभद भाग्य होता है।।७।। पापैस्तथा स्यादशुभंच भाग्यं मित्रादिभिः स्यान्नियमोविशिष्टात्।।८।। पापग्रह हों तो अशुभ भाग्य होता है। ग्रह मित्रादि गृहों में हो तो अत्युत्तम और नीचादि में हो तो निकृष्ट फल होता है।।८।। भाग्योदयसमयः- एवं भाग्यविर्यासौ भावानां च वदेत्तथा । भावग्रहांतर्कला द्विशत्याप्ताः समादयः ।।९।। भाव और ग्रह का अंतर करके उसका कला करके उसमें २०० का भाग देने से वर्ष मास दिनादि होता है।।९।। द्विस्थापिता करघ्नाश्च षष्ट्याप्ताः समादयः । अथेष्टादिफलघ्नं च समयो भाग्यभावयोः ।।१०।। इसे दो जगह रखकर एक जगह दो से गुणाकर ६० से भाग देने से जो वर्षादि फल प्राप्त हो इसका और पूर्वस्थापित फल का गुणा करने से जो वर्षादि प्राप्त हो उसी वर्षादि में भाग्योदय का समय समझना चाहिये।।१०।। प्रकारांतरेण- फलेन च दशघ्नेन रश्मिना च हृतास्तथा । भावाष्टवर्गोत्थ समाहतं तद्ग्रहांतरोत्थास्तु समादयः स्युः ।।११।।