बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ त्रयोदशोऽध्यायः । ७०१ अथवा ग्रह और भाव का अंतर करके शेष को १० से गुणाकर उसमें ग्रह के रश्मि से भाग देने से लब्ध वर्षादि में भाग्योदय कहना ।।११।। तत्तद्ग्रहोत्थाब्दहतास्तथा स्युरेवं तथा भाग्यफलानितत्र । स्थानानि नववर्गंश्च तेषां भाग्यफलं शृणु ।।१२।। अथवा अष्टवर्गोत्थ वर्षों से भाग्योदय कहना। इसी प्रकार सभी भावों के फल की प्राप्ति का समय निश्चित करना चाहिये और ग्रहों के स्थान और नव वर्ग हैं उनके संबंध से भाग्य को सुनो।।१२।। ग्रहाणांविशेषफलानि- ख्यादीनां क्रमाच्छृंग चामरादेश्च विक्रये । कृषिकर्मणि सेवायां पैशून्ये लिपिकर्मणि ।।१३।। यदि सूर्य उच्चादि शुभ वर्ग में हो तो क्रम से शृंग चामरादि राजचिह्न, कृषिकर्म, सेवा, दुर्जन कर्म, लिपि कर्म।।१३।। धनार्जने व्यये व्याधौ गमनागमविक्रये । विवादे प्रेतकार्ये च मातृणां कलहे तथा ।।१४।। धन संपादन, रोगनाशक कर्म, द्रव्य व्यवहार, फेरी करने से, विवाद, भ्रातृकलह ।।१४।। धनार्जने सुते दारग्रहणे लिपिकर्मणि । उच्चादिस्थानवर्गेषु लाभदश्च रविः क्रमात् ।।१५।। पुत्र से धनार्जन, विवाह, लेखन कर्म करने से लाभ होता है।।१५।। चंद्रस्यफलम् - शंखमाणिक्य मुक्तानां लाभो तत्क्रयविक्रये । सुरते · स्त्रीषु मैत्रे च राज्ञः पुरुषमित्रता ।।१६।। यदि चन्द्रमा अपने उच्चादि शुभ वर्ग में हो तो शंख, माणिक्य मुक्ता का लाभ और इनके खरीदने और बेचने से लाभ होता है। मैथुन, स्त्री से मैत्री, राजपुरुष से मित्रता ।।१६।। धनायतिस्तथा तत्र मैत्रं च कृषिकर्मणि । वस्त्रादि धनसिद्धिश्च ब्राह्मणेन विरोधता ।।१७।। धन का लाभ कृषिकर्म, वस्त्रादि के व्यापार से धन की सिद्धि होती है। ब्राह्मण से विरोध ।।१७।।