बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७०४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । विद्यार्जनं तथा सेवाकरणं संपदस्तथा । पुत्रैर्धनायतिर्मित्रैः स्त्रीभिश्च कृतकर्मणा ।।३१।। मित्रराशि का हो तो विद्या संपादन सेवा करना होता है। अधिमित्र गृह का हो तो ऐश्वर्य प्राप्ति, पुत्र मित्रादि से धन लाभ, स्त्री द्वारा द्रव्य लाभ।।३१।। विवाहो धनलाभश्च क्रमादेवं फलं वदेत् । विवाह आदि से धन का लाभ होता है।। भृगोःफलम् - राज्ञां कृत्यकरः श्रीमान्पुत्रबंधुसमन्वितः ।।३२।। यदि शुक्र अपने उच्चादि वर्ग का होकर भाग्य भाव में हो तो राजकर्मचारी, धनी, पुत्र तथा भाइयों से सुखी।।३२।। सेनानाथस्तथामात्यो विद्यार्जन परोधनी । पाठको याजकश्चाथ बहुस्त्रीकोऽतिशत्रुभे ।।३३।। सेनापति, प्रधान, विद्या संपादन में कुशल, धनी, अध्यापक, ऋत्विक्, अनेक स्त्री से युक्त होता है।।३३।। स्त्रीशक्तो निर्धनोमूर्खः पातकी भारकोभवेत् । सेनाधिकारी राज्ञश्च प्रियैर्बन्धुभिरायतिः ।।३४।। अधिशत्रु के गृह में हो तो स्त्री लालची, दरिद्र, बुद्धिहीन, पातकी, भारवाहक होता है। स्वगृह का हो तो सेनाधिकारी, प्रियबांधवों से इष्ट प्राप्ति।।३४।। सेवावृत्या च कृष्या च विद्यायाः पूर्तकर्मणा । सर्वसंपद्युतः श्रीमान् शुक्रस्यैव 'फलं' लभेत् ।।३५।। दूसरे की सेवा से, कृषि कर्म, विद्या से, इष्टपूर्तयज्ञ से वापी, कूप तालाब आदि कार्य से सर्वसम्पत्तिमान हो।।३५।। शनेःफलम् - कुजोच्चादिफल चार्केःकलांशादि फलं भवेत् । कलांशादिषु यत्रोक्तं कलांशादि फलंत्विदम् ।।३६।। उच्चादिषु तथा प्रोक्तं फलमेवं विचितयेत् ।