भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 715, कुल 800 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 715

अथ त्रयोदशोऽध्यायः । ७०३ क्षेत्रदासादिलाभं च कृषिकृत्यं धनायतिः । विवादो बंधुभिर्युद्धे जयश्च परायजः ।।२४।। क्षेत्रदासादि का लाभ, कृषि में लाभ, नीच राशि का हो तो वधु-विरोध, युद्ध में हानि, पराभव।।२४।। विद्याबुद्धिधनक्षेत्रं यशांसि च फलंति च । राज्ञस्तत्पुरुषेणैव स्वर्णक्षेत्रायतस्तथा ।।२५।। उच्चादि का हो तो विद्या, बुद्धि, धन, यश, स्वर्ण, भूमि, राजपुरुष से लाभ।।२५।। स्वक्षे धनायतिः प्रोक्ता लिपिना शिल्पकर्मणा । वस्त्रस्वर्णादिसिद्धिश्च राजस्त्रीभिर्धनायतिः ।।२६।। स्वराशि का हो तो लेखनक्रिया से, शिल्पकर्म से राजस्त्री के द्वारा, वस्त्र स्वर्णादि से धन लाभ।।२६।। कायस्य कर्मणा लाभो विद्यानाशः स्वकर्मणा । धननाशोऽश्मरी कुष्ठं कलांशादि फलंततः ।।२७।। समराशि का हो तो शरीर कृत्य से लाभ, अधिशत्रु गृह का हो तो विद्या की हानि, व्यापार में हानि, अदमरी (पथरी) रोग, कुष्ठ रोग हो।।२७।। विवादाद्बंधुभिर्दायो देशपर्यटनाद्धनम् । क्षेत्रसिद्धिर्जयो विद्यालाभोधान्यविवर्धनम् ।।२८।। अपने षोडशांश में हो तो बंधुविवाद से धन लाभ और देशांतर से धन लाभ, क्षेत्रसिद्धि, जय, विद्यालाभ, धान्यवृद्धि।।२८।। कृषिकर्मसमुद्योगः सेवाकरणकौशलम् । कृषिकर्म, नौकरी में तरक्की, विद्या संपादन में कुशलता हो।। गुरोःफलम् - विद्यार्जनमथप्रोक्तं गुरोः श्रीमान् सुखी गुणी ।।२९।। गुरु भाग्य भाव में हो तो लक्ष्मी से युक्त, सुखी, गुणी।।२९।। वह्वायतिरमात्यत्वं सर्वसम्पत्समन्वितः । धननाशः प्रमोहेण क्षेत्रनाशः पराभवः ।।३०।। अधिक लाभ से युक्त, प्रधानत्व, सर्वसंपत्ति से युक्त होता है। शत्रु राशि का हो तो द्रव्यनाश, क्षेत्रनाश, पराजय होती है।।३०।।