बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७१३ त्रिंशद्दिशो नखाः षष्ठिसूर्यमूर्च्छाजिनाजिनाः । आकृतिर्भानिभाकार्ग्निनखाश्छंदः शतं नखाः ॥५१॥ ३०।१०।२०।६०।१२।३१।२४।२१।२७।२२।३।२०।२६।१००।२०।२ ॥५१॥ त्रिंशत्खवेदा दिग्विश्त्रे शतं षष्ठिः शतंजिनः । वेदाः खवेदाः पूर्वार्धे परार्धे प्राग्वदत्रतु ॥५२॥ एते योगवलाच्चैव केवलं दुर्मतिप्रदाः । ३०।४०।१०।१३।१००।६०।१००।२४।४।४० के पूर्वार्ध में और राशि के उत्तरार्ध में विलोम क्रम से दुर्गति हैं॥५२॥ कुब्जादियोगाः- दिनर्क्ष चक्रसंख्याः स्युरादिमध्यावसानिकाः ॥५३॥ दिन, नक्षत्र और राशि इनकी संख्या आदि मध्य और अंत्यभाग का योग॥५३॥ सप्तविंशतिसप्तत्यां शते षष्ठ्यां शतद्वये । षट्पंचांशतिविंशे च षण्णवत्यामशीतिके ॥५४॥ यदि २७।७०।१००।६०।२००।६।५०।२०।९६।८० ।५४। षष्ठिभागे च विंशत्यां शतषष्ठ्यां शतद्वये । कुब्जः कलांशेमूकस्तु शतद्वयशतत्रये ॥५५॥ १०।६०।२०० हो तो कुब्ज होता है। यदि २००, ३०० ।।५५।। सहस्रे द्विशते जातः पंचमे पापसंयुते । द्वित्रिपंचाष्टदिग्विश्नृपातिधृतिभूमयः ॥५६॥ १०००, २०० हो और पाँचवें भाव में पापग्रह हो तो मूक होगा। २।३।५।८।१०।१३।१६।१८।१ ।।५६।। नवदिग्भसुरैस्तानैस्तिथिविश्वाष्टकैः क्रमात् । गुणेन वामतः प्रोक्तो लक्ष्यंशे श्रीसमन्वितः ॥५७॥ ९।१०।२७।३३।४९।१५।१३।८. इनको वांयें भाग से गुंणने प्राप्त अंश लक्ष्यंश में श्रीमान् होता है॥५७॥